शुक्रवार, अगस्त 13, 2010

पुरुषोत्तम की जनानी : लीलाधर जगूड़ी

एक पेड़ को छोड़कर फिलहाल और कोई जिन्दगी मुझे
याद नहीं आ रही
जो जिस समय डरी हो और उसी समय मरी न हो

जिसने मरने का पूरा उपाय रचे जाते देखा हो
और न जी पाने वालों के बाद भी जिन्दा रहना और बढ़ना न छोड़ा हो
जो न कह पाते हुए भी न भूल पाने का हवाला देकर
फाँसी के फन्दे की याद दिला देता हो

भले ही ऐसे और जो ऐसे नहीं हैं वैसे पेड़ अँधेरे में भूत नजर आते हों
पर वे रातों को घरांे में
खिड़कियों के सींखचे पार करके आ पहुँचते हैं
और घर की सब चीजों को छूकर
नाक से फेफड़ों में चले जाते हैं
और बालों, नाखूनों तक से वापस होकर
रोशनदानों से बाहर निकलकर फिर सींकचों से अंदर चले आते हैं

वैसे वे पेड़ अँधेरे में भ्ूतों से और उजाले में देवदूतों से नज़र आते हैं
कि जैसे अलग-अलग किस्म का दरबार लगाते हुए हों
कुछ उत्पादन का कुछ व्यक्तित्व की छाया का
कुछ अपने छोटेपन का कुछ अपनी ऊँचाइयों का ... दरबार...
पर जो पेड़ खेत किनारे पगडंडी से थोड़ा ऊँचाई पर दिखते हैं
जैसे जन्म से ही सिंहासनारूढ़ हों
भले ही कुछ तो सिपाहियों जैसे दिखते हैं
पर एक जो सयाना सा बीच में कुछ ज्यादा उचका हुआ नेता-सा दिखता है
उससे पता नहीं पुरुषोत्तम की जनानी ने
कब, क्या और कैसे कोई आश्वासन ले लिया कि बेचारी ने वह योजना
बना डाली
सारे विकल्प बेकार हो जाने पर जिसका नम्बर आता है

पुरुषोत्तम की जनानी द्वारा आत्महत्या के अनजाने कारणों वाली रात से
वह नेताओं वाली शैली में नहीं बल्कि एक पेड़ वाली खानदानी शैली में
लाश के साथ टूटने की हद तक झुका रहा काफी दिन
जैसे मनुष्य मूल्यों के अनुसार अटूट सहारा देना चाह रहा हो
जो मनुष्य होकर पुरुषोत्तम नहीं दे सका अपनी जनानी को

बकौल लोगों के इस जनानी मंे धीरज न था
और पेड़ की चुप्पी कहती है कि उसमें उतना वजन न था
कि टहनी फटकर टूट जाती या इतना झुक जाती
कि मरने से पहले ही वह जमीन छू लेती और बच जाती

मकानों मंे जो घर होते हैं और घरों में जो लोग रहते हैं
और लोगों में जो दिल होते हैं और दिलों में जो रिश्ते होते हैं
और रिश्तों में जो दर्द होते हैं
और दर्द में जो करुणा और साहस रहते हैं
और उनसे मनुष्य होने के जो दुस्साहस पैदा होते हैं
वे सब मिलकर इस टीले वाले पेड़ तक आये थे रात
पुरुषोत्तम की अकेली बीवी का साथ निभाने या उसका साथ छोड़ने
एक व्यक्ति के निजी कर्त्तव्य या दुखी निर्णयों ने भी
अंतिम क्षण तक कितनी पीड़ा से उसका साथ छोड़ा था यहाँ पर,
चरमराया पेड़ मारे घबराहट के कभी बता न सकेगा

पूरे इलाके में छह महीने से एक मनुष्य की मृत्यु टँगी हुई है
उस पेड़ पर
जो कैसे और क्यों जिन्दा रहने पर पछताया हुआ दिख रहा है
मजबूत समझकर पुरुषोत्तम की जनानी ने उस पर फंदा डाला होगा
जो पहली बार डरा होगा उसकी कमजोरी और अपनी मजबूती से
कई दिन तक रोज जुटने वाली भीड़ के बावजूद उसकी निस्तब्धता तो
यही बताती थी

अब इस पेड़ के सिवा पुरुषोत्तम की जनानी की जिन्दगी के बारे में
कोई दूसरी जिन्दगी मुझे फिलहाल याद नहीं आती
जो किसी के सामने जिस समय डरी हो और उसी समय मरी न हो ...

बाकायदा फंदा डालते हुए उसने
कुछ तो और समय करने की तैयारी में लगाया होगा
पहले बिल्ली की तरह चिपककर, तने पर वहाँ तक पहुँची होगी
जहाँ से पेड़ चैराहे की तरह कई शाखाओं में बँट गया है
फिर कमर से रस्सी खोलने के बाद टहनी पर फंदा बनाया होगा
तब एक छोर गले में बाँधकर कूदने का इरादा किया होगा
तब सुनिश्चित होकर अनिश्चित मंे छलाँग लगायी होगी
मरने से कुछ देर पहले वह जीवित झूली होगी

उसकी कोई झिझकी या ठिठकी मुद्रा बची रह गयी हो
तो पेड़ की अँधेरी जड़ों में होगी
आसमान में कहीं कुछ अंकित नहीं है

पता नहीं पेड़ और पुरुषोत्तम की जनानी में जीने के बदले
मरने का यह रिश्ता कैसे बना ?
जिस पर मरने वाले के बजाय जीने वाला पेड़ होकर भी शर्मिन्दा है
इसी शर्मिन्दगी में से पैदा होने हैं इस साल के फूल-फल और पत्ते
पर इस देश में बसंत पर शर्मिन्दगी का संवाद सुनने-पढ़ने की परम्परा नहीं है।

3 टिप्‍पणियां:

  1. बेहतरीन कविता और प्रस्तुति...
    पुरुषोत्तम की जनानी...
    शीर्षक शायद एक मिथक पर खूब इशारा कर रहा है...

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  2. लीलाधर जगूड़ी की यह कविता बात ही बात में बहुत कुछ कह देती है।

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