बुधवार, जुलाई 14, 2010

रमेश प्रजापति की तीन कविताएँ

अच्छे दिन

अच्छे दिन
तैरते हैं झील की आँखों में
रंग-बिरंगे जलपाखी-से
चहकते हैं बाँसों के झुरमुट में
झिलमिलाते हैं सुहागिन की बिंदी में

जीवन के हरे-भरे जंगल में
फुदकते हैं खरगोश-से

सदियों तक
बसी रहती है खंडहरों में
अच्छे दिनों की गमक

चमकते हैं स्मृतियों की रेती में
शंख-सीपियों से
थिरकते हैं मोर के पंखों पर
टँके चाँद-सितारों-से

अचानक बतियाते हैं आकर
हरिया की झोंपड़ी में
रातभर

अच्छे दिन
झरते हैं माँ के सूनेपन में
झटकते हुए धूल से सनी
पिता की क़मीज़

तपती मरुभूमि में
बुरे दिनों की नागफनियों के सिर पर
मासूम फूल-से
खिलखिलाते हैं अच्छे दिन।

बुरे दिन

बुरे दिन
शहर की मनहूस जगह से
चमगादड़ से निकलकर
बो जाते हैं अँधेरा
जीवन के उजले चक में

बुरे दिनों की आहट पर
गौरैया-से
फुर्र हो जाते है अच्छे दिन
काँप उठती हैं पत्तियाँ
हवा की हर बात पर
सिर हिलाकर
हुँकारा देना बंद कर देते हैं पेड़
धरती के गाल पर
उमड़ उठती है आँसुओं की नदी

कभी-कभी
शुरू होते हैं बुरे दिन
सुहागिन का दर्पण टूटने से,
काली बिल्ली का रास्ता काटने से,
पूजा का दीया बुझने से,
बाहर जाते वक़्त पड़ोसी के टोकने से,
शनि, राहु ,........,
केतु की वक्र दृष्टि से

अच्छे दिनों की रोटी में
किरकिराते हैं बुरे दिन
फुटपाथ पर बैठा
टाँग हिलाता मज़दूर
चबा लेता है इन्हीं बुरे दिनों को
मुट्ठी भर भुने चनों-सा।

टुकड़ा-टुकड़ा सूरज

नदी-
बाँटकर पानी
लंबी यात्रा की थकान से
बैठ जाती है जाकर
समुद्र की गोद में

चींटियाँ-
बाँटकर शक्कर की तरह काम
भाँपकर बरसात की आहट
उठाकर अंडे
चली जाती हैं धरती की कोख में

पेड़
बाँटकर अपना सब कुछ
दानवीरों-से
हो जाते हैं अमर

दीवार
उठती है जो
बाँटती हुई आँगन
भालू की जीभ-सी
चाटती है मेरा अंतःकरण

सूरज-
चला आता है प्रतिदिन
तंदूरी रोटी-सा
परिंदों की चोंच में टँगा
और
बँट जाता है घर-घर में
टुकड़ा-टुकड़ा।

(
रमेश प्रजापति जाने-मने युवा कवि है. उनका एक कविता संग्रह 'पूरा हँसता चेहरा' शिल्पायन से प्रकाशित हो चुका है. दिल्ली में रहते है. अध्यापन करते है. उपरोक्त कविताओं में से 'अच्छे दिन' तथा 'बुरे दिन' कविताएँ परिकथा के पिछले अंक में प्रकाशित हुई हैं.)

11 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर कविताएँ. सामाजिक विसंगतियों और विरूपताओं की मार्मिक अभिव्यक्ति इन कविताओं में हुई है. बधाई.

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  2. अच्छी बिम्बपरक कविताएँ है.

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  3. मंगलवार 19 जुलाई को आपकी रचना ... चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर ली गयी है आभार

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  4. मंगलवार २० जुलाई को आपकी रचना ... चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर ली गयी है आभार

    http://charchamanch.blogspot.com/

    दिनांक गलत छप गयी थी

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  5. कमाल की कविताएँ हैं॥

    पहली कविता ने तो मन को बाँध ही लिया ...

    आज पहली बार आपकी कविताएँ पढ़ें...साप्ताहिक काव्य-मंच पर ....बेहद प्रभावी लगीं....बधाई...

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  6. बेहतरीन कवितायेँ हैं...शब्दों में कैसे प्रशंशा की जाये...ये सोच रहा हूँ...विलक्षण तरह से भावों को समेटा गया है... वाह...वा...
    नीरज

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  7. बहुत अच्छा....मेरा ब्लागः"काव्य कल्पना" at http://satyamshivam95.blogspot.com .........साथ ही मेरी कविता "हिन्दी साहित्य मंच" पर भी.......आप आये और मेरा मार्गदर्शन करे...धन्यवाद

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  8. वास्तविकता को कह दिया अच्छे और बुरे दिन के माध्यम से

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  9. बहुत अच्छी कविता


    जयचन्द प्रजापति

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