रविवार, जनवरी 08, 2012

कर्मनाशा : सिद्धेश्वर सिंह

कवि सिद्धेश्वर सिंह का कविता-संग्रह ‘कर्मनाशा’ अंतिका प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है। आवरण रवीन्द्र व्यास के ब्रश से और फ्लैप अशोक कुमार पाण्डेय व अजेय ने लिखा है। काव्य-प्रसंग की ओर से उन्हें हार्दिक शुभकामनाएँ प्रदान करते हुए प्रस्तुत है उनकी कुछ कविताएँ -

दिन : वे दिन, ये दिन
( बरास्ता निर्मल वर्मा )

वे दिन सचमुच थे 'वे दिन'
जब 'लाल टीन की छत' से
दिखाई देती थी 'चीड़ों पर चाँदनी'
जबकि 'बीच बहस में'
हुआ करती थी दुनिया की 'जलती झाड़ी'
व 'शब्द और स्मृति' पर मँडराते दीख जाते थे
'कव्वे और काला पानी'।
तब
'ढलान से उतरते हुए' हम
अपने ही एकान्त में
तलाश रहे होते थे 'एक चिथड़ा सुख'
ये वे दिन थे
जब 'रात का रिपोर्टर'
'हर बारिश में' सुना करता था
'धुन्ध से उठती धुन'
क्या सचमुच
वे दिन और दिन थे - एक 'दूसरी दुनिया' ?
अब
कोई नहीं कहता कि सुनो 'मेरी प्रिय कहानियां'
अब
'शताब्दी के ढलते वर्षों में'
तय नहीं है
किसी का कोई 'अंतिम अरण्य'
सबके पास सुरक्षित हैं - 'सूखा तथा अन्य कहानियाँ'
अपने - अपने हिस्से के 'तीन एकान्त'
और 'पिछली गर्मियों में' की गईं यात्राओं की थकान।
अब
कलाकृतियों के जख़ीरे में सब है
बस नहीं है तो 'कला का जोखिम'
और न ही कोई 'इतिहास स्मृति आकांक्षा'
यह कोई संसार है
अथवा एक संग्रहालय उजाड़ !
पहाड़ अब भी उतने ही ऊँचे है
हिम अब भी उतना ही धवल
कहीं वाष्प बन उड़ तो नहीं गए निर्मल जल के प्रपात
रात के कोटर से अब भी झाँकता है सूर्य कपोत
परित्यक्त बावड़ी में अब भी खिलती है कँवल पाँत।
घास की नोक पर ठहरी हुई
ओस की एक अकेली बूँद से बतियाते हुए हम
बुदबुदाते हैं - वे दिन , वे दिन
और अपने ही कानों तक
पहुँच नहीं पा रही है कोई आवाज।

नया साल
हर बार कैलेन्डर आखिरी पन्ना
हो जाता है सचमुच का आखिरी
हर बार बदलती है तारीख
और हर बार आदतन
उंगलियाँ कुछ समय तक लिखती रहती हैं
वर्ष की शिनाख्त दर्शाने वाले पुराने अंक।

हर बार झरते हैं वृक्ष के पुराने पत्ते
हर बार याद आती है
कोई भूली हुई - सी चीज
हर बार अधूरा - सा रह जाता है कोई काम
हर बार इच्छायें अनूदित होकर बनती हैं योजनायें
और हर बार विकल होता है
सामर्थ्य और सीमाओं का अनुपात।

हर बार एक रात बीतती है -
कु्छ - कुछ अँधियारी
कुछ - कुछ चाँदनी से सिक्त
हर बार एक दिवस उदित होता है -
उम्मीदों की धूप से गुनगुना
और उदासी के स्पर्श क्लान्त।

रोहतांग
यहाँ सब कुछ शुभ्र है
सब कुछ धवल
बीच में बह रही है
सड़कनुमा एक काली लकीर।
ऊपर दमक रहा है
ऊष्मा से उन्मत्त सूर्य
जिसके ताप से तरल होती जा रही है
हिमगिरि की सदियों पुरानी अचल देह।
सैलानियों के चेहरे पर
दर्प है ऊँचाई की नाप- जोख का
पसरा है
विकल बेसुध वैभव विलास।
मैं भ्रम में हूँ
या कोई जादू है जीता जागता
इस छोर से उस छोर तक
रचता हुआ अपना मायावी साम्राज्य.

निरगुन
सादे कागज पर
एक सीधी सादी लकीर
उसके पार्श्व में
एक और सीधी- सादी लकीर।
दो लकीरों के बीच
इतनी सारी जगह
कि समा जाए सारा संसार।
नामूल्लेख के लिए
इतना छोटा शब्द
कि ढाई अक्षरों में पूरा जाए कार्य व्यापार।
एक सीधी सादी लकीर
उसके पार्श्व में
एक और सीधी- सादी लकीर
शायद इसी के गुन गाते हैं
अपने निरगुन में सतगुरु कबीर

घृणा
वे घृणा करते हैं उनसे
जो घृणित हैं
वे घृणा करते है उनसे भी
जो घृणित होने जा रहे हैं
निकट भविष्य में
वे घृणा करते हैं
घृंणा शब्द से
फिर भी
बार उच्चरित करते हैं यह ( घृणित ) शब्द
वे घृणा करते हैं कमरे के सूनेपन से
वे घृणा करते हैं बहर के शोरगुल से
वे घृणा करते हैं खुँटियाई हुई दाढ़ी से
वे घृणा करते हैं घिसे हुए ब्लेड से
वे घृणा करते हैं प्रेमिकाओं और परस्त्रियों से
वे घृणा करते हैं नौकरी और सरकार से
अंतत:
वे अपने आप से भी घृणा करने से नहीं चूकते।
वे सुखी हैं
वे कुछ नहीं करते
बस घृणा करते है।

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संपर्क :
सिद्धेश्वर सिंह
ए-०३, ऑफिसर्स कालोनी,टनकपुर रोड, अमाऊँ
पो- खटीमा (जिला -ऊधमसिंह नगर) उत्तराखंड
पिन- २६२३०८ मोबाइल -०९४१२९०५६३२
ईमेल- sidhshail@gmail.com


'कर्मनाशा' ( कविता संग्रह) २०१२ - सिद्धेश्वर सिंह
प्रकाशक : अंतिका प्रकाशन, सी-56/यूजीएफ-4, शालीमार गार्डन, एकसटेंशन-II, गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.), फोन : 0120-2648212 मोबाइल नं.9871856053, ई-मेल: antika.prakashan@antika-prakashan.com, antika56@gmail.com, मूल्य : रु. 225

6 टिप्‍पणियां:

  1. बेहतरीन कविताएँ ! पुस्तक प्रकाशन पर हार्दिक बधाई स्वीकारें।

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  2. बधाई सिद्धेश्वर सिंह जी !

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  3. शुक्रिया मित्र, इसे साझा करने के लिए।

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  4. सुखी लोगों की घृणा बहुत फैली है चारों तरफ।
    ...परमेंद्र वैसे तो दिल्ली आना है लेकिन चूक गया तो किताब खरीदके रख लियो। वैसे डबल बधाई, कर्मनाशा के लिए भी और रवींद्र व्यास दिखाई दिए, इसकी भी। `हरा कोना` के लिए दबाव बनाया जाए। सिद्धेश्वर जी की एक कविता वो अपने हरे चित्र के साथ पढ़वाएं!

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  5. कर्मनाशा का कवर रवींद्र व्यास के ब्रश का ही कमाल है भाई।

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