मंगलवार, अप्रैल 24, 2012

अनवारे इस्लाम* की ग़ज़लें

1.
सगे भाई हैं, उनमें प्यार भी है
मगर आँगन में इक दीवार भी है

बहुत मासूम है चेहरा किसी का
नहीं लगता कि दुनियादार भी है

बहुत-सी ख़ूबियाँ हैं उसमें लेकिन
कमी बस ये कि वो ख़ुद्दार भी है

बुराई पीठ पीछे कर रहा है
वही, जो शख़्स मेरा यार भी है

सुलहकुल चाहता है सबके हक़ में
वो झुकने के लिए तैयार भी है

वो करता है बहुत से काम लेकिन
हक़ीक़त ये कि वो बेकार भी है

2.
मुझे इस बात से उलझन बहुत है
तेरे लहजे में तीख़ापन बहुत है

मुझी से बात करते थे जि़यादा
मुझी से आजकल अनबन बहुत है

कई दिन से वो कुछ बेचैन सा है
कई दिन से मुझे उलझन बहुत है

सभी गलियों में चेहरे अजनबी हैं
सभी गलियों में सूनापन बहुत है

तेरी बातों से डर लगने लगा है
तेरी बातों में मीठापन बहुत है

चमक दिखलाऊँ अपनी डूब जाऊँ
यही दो-चार दिन जीवन बहुत है

3.
बीज नफ़रत के जो भी बोता है
फ़स्ल आने पे ख़ूब रोता है

रंग जब भी उभारता है वो
उँगलियाँ ख़ून में डुबोता है

जाग उठने की फि़क्र रहती है
चैन की नींद कौन सोता है

तेरी बातों से चोट लगती है
चोट लगने से दर्द होता है

बादलों से नहीं रही उम्मीद
आँसुओं से ज़मीं भिगोता है

बीच लोगों के ख़ूब हँसता है
जाके तनहाइयों में रोता है

* वरिष्ठ शायर अनवारे इस्लाम भोपाल में रहते हैं और ‘सुख़नवर’ पत्रिका का सम्पादन करते हैं। सम्पर्क: सी-16, सम्राट कालोनी, अशोका गार्डन, भोपाल

3 टिप्‍पणियां:

  1. पहली गजल बहुत शानदार है और ऐसे अनेक शख्‍स हैं जो इस कदर जिंदगी जीते हैं ....नाकारों में जिनकी गिनती होती है पर उनके बिना काम नहीं चलता

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  2. वो करता है बहुत से काम

    हकीकत ये कि वो बेकार भी है
    मेरी प्रतिक्रिया इसी बात पर है

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  3. पंकज सिघंई सागर मप्रमई 06, 2012 6:05 pm

    पहली गजल पर एक शेर कहना चाहूगा उन तमाम भाग्यहीन (नकारो)लोगो पर 1. किसी की बदाउ है या मेरी तकदीर की साजिश! 2. कि खुशी के काफिले बचकर मेरे घर से गुजरते है!

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