सोमवार, नवंबर 01, 2010

स्मरण : योगेश छिब्बर

कुछ माह पूर्व जब श्री योगेश छिब्बर को देखा तो यह पूछने का साहस नहीं हुआ कि अब स्वास्थ्य कैसा है, क्योंकि बीमारी की पीड़ा को चेहरे की मुस्कराहट ने भरपूर सफलता के साथ ढक रखा था। पिछले दिनों मनु स्वामी ने सूचना दी कि उनका स्वास्थ्य बहुत बिगड़ गया है और आल इंडिया मैडिकल और अपोलो ने भी हाथ खड़े कर दिये हैं और 23 अक्तूबर को उनके निधन की सूचना भी मनु भाई ने दी। (हालाँकि उनके निधन से एक दिन पूर्व ही उनके निधन का झूठा समाचार मुजफ्फरनगर में फैल गया था, यह सूचना मुझ तक भी पहुँची थी, फिर मैंने भी एकाध जगह फोन किया, सो मैं भी सहारनपुर के कवि-समाज से क्षमाप्रार्थी हूँ) योगेश छिब्बर उन कवियों में थे जो मिलते ही आत्मीयता का संवाद कायम कर लेते थे। उनका मंच से कविता का प्रस्तुतीकरण भी गजब का था। समकालीन कविता के मुहावरे के साथ-साथ पंजाबी की टप्पे जैसी विधा का हिन्दी में प्रयोग उन्होंने किया। योगेश छिब्बर के कविता-संग्रहों में प्रमुख हैं - चिड़िया बम नहीं बनाएगी, साँसों के वृन्दावन में, तुम अपनी प्यास जितने हो, नैना गिरवी रख लिये, हाथों में ताजमहल, जिकर पिआरे का।
श्री छिब्बर को विनम्र श्रद्धांजलि सहित प्रस्तुत हैं उनकी कुछ कविताएँ -

तितली
तितली जब भी उड़ेगी
किसी फूल की तरफ उड़ेगी

तितली जब भी उतरेगी
किसी फूल पर उतरेगी

तितली जब भी नष्ट होगी
कहीं फूलों के बीच नष्ट होगी

उसे जीना आता है
उसे मरना आता है।

चिड़िया बम नहीं बनाएगी
चिड़िया को भी खतरा है
लंबे डैनों वाले बाज से
उसके बच्चों को खतरा है
भूखे काले नाग से
उनका घोंसला डरता है
शैतान लड़कों के हाथ से
मगर चिड़िया बम नहीं बनाएगी

चिड़िया के भी दुश्मन हैं
मगर वह बम नहीं बनाती

चिड़िया की किसी पीढ़ी में
बुद्ध ने जन्म नहीं लिया
चिड़िया के संसार में
कोई ईसा नहीं हुआ
फिर भी
इतने दुश्मनों और इतने खतरों के बीच
चिड़िया ऐसे जीती है
जैसे उसे समझ आ गए हों
बुद्ध और ईसा
कल बच्चे हैरान होंगे
सोचेंगे
यह चिड़िया सुरक्षित कैसे है
बम के बिना जिये जाती है
उड़ती है
गाती है

बार-बार घोंसला बनाती है
जिसमें न कोई चारदीवारी है
न काँटेदार तारें
न कोई लाठी वाला चैकीदार
जिन्दा रहने की तमीज नहीं चिड़िया को

कुछ बच्चे सोचेंगे
चिड़िया ‘एब्नाॅर्मल’ होती है
दुश्मनों के होते हुए
बम की नहीं सोचती

मगर चिड़िया नहीं सोचेगी
वह बम नहीं सोचेगी
वह युद्ध नहीं सोचेगी

चिड़िया आदमी नहीं है।

कुछ क्षणिकाएँ
1.
सुख यह नहीं
कि जीवन में तुम भी हो
सुख यह है
कि जीवन में तुम ही हो।

2.
न उतने हो
न इतने हो
तुम अपनी प्यास जितने हो।

3.
लो, तुम्हारे भीतर रखता हूँ
खरे विचार की चिनगारी
अब आग जले
तुम्हारी जिम्मेदारी।

5 टिप्‍पणियां:

  1. छिब्बर जी को विनम्र श्रद्धाँजली। उन्की रच्नायें अच्छी लगी धन्यवाद।

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  2. अद्भुत कविताएं। पहली बार पढ़ने में आए। चिडि़या बम नहीं बनाएगी सब कुछ तो कह देती है जो लोग महाकाव्‍यों में नहीं कह पाते। उतनी ही सहज तितली,तितली की तरह। भाई योगेश को विनम्र सलाम। कभी मौका हो तो और भी कविताएं पढ़वाएं उनकी।

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  3. परमेन्‍द्र भाई अच्‍छा हो कि आप उनके जीवनकाल की अवधि का उल्‍लेख भी कर दें। लगता है वे जल्‍द ही चले गए। पर इसी से यह समझ आता है कि अच्‍छा और सार्थक लिखने के लिए लंबा जीवनकाल नहीं समझ की जरूरत होती है। और समझ दिमाग खुला रखने से बनती है,बंद रखने से नहीं।

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  4. योगेश जी को शत शत नमन हमारी और से एवं ''आखर कलश '' कि और से भी !
    योगेश जी कि छोटी कविताए बेहद प्रभावी है , अच्छी लगी मगर ये पढ़ खेद भी हुआ कि उम्दा कवि हम सब के बीच नहीं रहे ,
    शत शत नमन !

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  5. लो, तुम्हारे भीतर रखता हूँ
    खरे विचार की चिनगारी
    अब आग जले
    तुम्हारी जिम्मेदारी।...

    एकदम खरा सा कुछ खनका गये हैं...
    अब बाकि हमारी जिम्मेदारी...

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