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शनिवार, जनवरी 21, 2012

मैं इनकार क्यों करूँ : एलिस वाकर (अनुवाद एवं प्रस्तुति : यादवेन्द्र)

(1944 में जनमी अमेरिका की प्रख्यात अश्वेत कवि और एक्टिविस्ट )













मैं
इनकार क्यों करूँ
क्यों रोकूँ अपने होंठ
और उनकी मुस्कान...
मैं इनकार क्यों करूँ
क्यों छुपाऊँ अपना दिल
और उनके दुःख...
मैं इनकार क्यों करूँ
फेरूँ अपनी आँखें
और उनके आँसू...
मैं इनकार क्यों करूँ
बाँध कर रखूं अपनी लटें
और उनमें बसी हुई
अपनी उम्र की आवारगी...
मैं करुँगी भी तो
ऐसा कुछ भी नहीं है मेरे पास अपना
जिसको इनकार करूँगी.

मंगलवार, नवंबर 29, 2011

लड़की मत देखो आसमान : कांता सुधाकर

थोड़े समय पहले मेरी कान्ता भाभी से मुलाकात हुई--लगभग 30 -32 सालों बाद. मेरे शुरूआती साहित्यिक संस्कार जिन लोगों की देख रेख में बने और विकसित हुए हैं,कान्ता भाभी मेरे जीवन के उन विशिष्ट लोगों में एक हैं.अपने छात्र जीवन में एक नाटक में उनकी तलत महमूद सरीखी कांपती हुई मोहक आवाज सुन के मैं उन तक खिंचा चला गया था.इस बार की मुलाकात में उन्होंने अपनी किताब पढने को दी तो मैं रोमांचित हो गया....मुझे वो जमाना गया जब रसोई में काम करते हुए कभी किसी कागज पर तो कभी किसी कागजी थैले पर वो मन की बातें लिख दिया करती थी...
इस संग्रह से कुछ कवितायेँ मैं आपके पाठकों तक पहुंचाने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा हूँ....उम्मीद है ये कवितायेँ आपको भी वैसे ही पसंद आयेंगी जैसे मुझे आयीं... पाठक उनसे संपर्क करना चाहें,मैं उनके लिए फोन नंबर दे रहा हूँ...9470101657
-यादवेन्द्र

सीख
लड़की
मत देखो आसमान
सितारे उतर आएँगे
आँखों में

लड़की
मत निहारो फूलों को
टँक जाएँगे बालों में।

पर्वतों के पार जो
उगा बड़ा-सा सूरज अभी-अभी
तुम्हारी हँसी देखने को
रुक जाएगा
ठहर जाएगा अब
इसी घाटी में।

लड़की
रुक जाओ
थम जाओ
किसी नदी का रुख
मुड़ न जाए कहीं
तुम्हारे गीतों से।

इसीलिए
रुक जाओ
थम जाओ
किसी नदी का रुख
मुड़ न जाए कहीं
तुम्हारे गीतों से।

इसीलिए
वापस हो जाओ
सुरक्षित रहो हमारी
निषेधों की दुनिया में।

क्योंकि
अच्छा हुआ
कि मैं सीता नहीं
तुम राम नहीं
केवल मनुष्य हैं हम।

अग्नि-परीक्षा
लेते नहीं
देते नहीं
क्योंकि हमें
एक-दूसरे से प्यार है बहुत,

क्योंकि हमें
एक-दूसरे से प्यार है बहुत।

क्योंकि हमें
इतिहास बनने के लिए
नहीं करनी है कोई लीला।

अच्छा है
अच्छा है
बहुत अच्छा है,
कि बादल
कभी बिकता नहीं
किसी बाजार में।

अच्छा है
बहुत अच्छा है
कि हवा
कभी रुकती नहीं
किसी के लाॅन में।

अच्छा है,
बहुत अच्छा है,
कि झरना
कभी गिरता नहीं
किसी के फार्म मंे।

अच्छा है,
बहुत अच्छा है,
कि धूप
कभी टिकती नहीं
किसी परदेशी के प्लान में
अच्छा है,
बहुत अच्छा है,
कि
बादल,
हवा,
धूप,
झरना
कभी जाते नहीं
किसी के पर्सनल एकाउंट में,
नहीं तो
पता नहीं
कहाँ जाते
दुनिया के
बिन खाते के बाकी जीव।

रविवार, अक्टूबर 09, 2011

कुछ जापानी गद्य कविताएँ : अयाने कवाता ( प्रस्तुति : यादवेन्द्र)



एक नवजात के साथ

एक आदमी मेरा पीछा कर रहा है...उस से बचने के लिए मैं एक नवजात बच्चे से दोस्ती गांठ लेता हूँ.मेरा मकसद सिर्फ इतना है कि उस आदमी को लगे कि मैं इस नवजात बच्चे को प्यार कर रहा हूँ सो वो मेरा पीछा करना छोड़ कर कहीं कुछ और देखे.ताज्जुब, नवजात बच्चा सारे हालातों को बड़ी अच्छी तरह समझ रहा है.


बाँसुरी

मैंने हाथ में एक बाँसुरी पकड़ रखी है और बार बार इसको बजाने की कोशिश कर रहा हूँ...कोई आवाज नहीं निकल रही.अचानक मैं अपनी साँस अंदर खींचता हूँ तो मुझे लगता है जैसे चाँदी के वर्क का कोई टुकड़ा शायद मुँह के अंदर चला गया.मैं चक्कर में पड़ जाता हूँ: बाँसुरी के अंदर ऐसा क्या भरा हुआ है कि देखते देखते बाँस की बनी हुई पतली सी बाँसुरी सीप कि तरह से बीचों बीच आधी फट जाती है...और मुझे अंदर भरे हुए धातु के कबाड़ और घास फूस के बीज दिखाई देने लगते हैं.अब समझ में आता है कि बांसुरी इस लिए बजती है क्योंकि उसके अंदर इतना कुछ भरा रहता है...मैं अंदर से निकला एक एक तिनका वापस बाँसुरी के अंदर भर देता हूँ और एकबार फिर उसको बजाने की कोशिश करता हूँ...पर आवाज है कि बाँसुरी से निकलने का नाम नहीं लेती.


भागना

कोई मेरा पीछा कर रहा है इसी लिए मैं सरपट भाग रहा हूँ...पर समस्या यह नहीं है कि कोई मेरा पीछा कर रहा है , बल्कि मेरे भागने का ख़ास ढंग सारी फजीहत की जड़ है.


घोड़ा

वजह तो सही सही ध्यान नहीं पर मैंने एकबार एक घोड़ा ख़रीदा.तब मुझे यह भी मालूम नहीं था कि उस से काम कैसे लेना है.मुझे लगा कि यदि उसकी गर्दन में रस्सी डाली जाये तो घोड़े को तकलीफ होगी.मैंने एक बार मुँह में लगाम लगे एक घोड़े को देखा था,पर यही नहीं मालूम हो पाया कि मुँह पर लगाम होने पर घोड़ा खाता कैसे होगा...मुझे अब भी शक है कि भूख लगने पर इस हालात में घोड़ा घास खाता भी होगा.या यह भी मेरी जिज्ञासा थी कि घोड़े को किसी पेड़ के नीचे बांध दूँ तो बरसात होने पर वह भीग तो नहीं हो जायेगा...इस परिस्थिति में घोड़े पर क्या बीतेगी,और मेरा ऐसा करना ठीक होगा या नहीं.मुझे आस पास किसी अस्तबल का भी पता नहीं था.एक दिन अचानक क्या देखता हूँ कि घर से घोड़ा गायब हो गया...अब वह मेरी छोटी बहन बन कर उपस्थित हुआ.
वह रातों में नंगी घास पर लेटी रहती है और इसी में बीच बीच में नींद लेने की कोशिश करती है. मुझे हर बार अंदेशा होता है कि उसको ठण्ड न लग जाये पर वह मेरी ओर पलट कर जवाब देती है: मैं बिलकुल ठीक हूँ दीदी.
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अयाने कवाता 1940 में जनमी जापानी कविता की आधुनिक धारा की महत्वपूर्ण कवि हैं.इन दिनों इटली में रहती हैं.जापानी भाषा के उनके दस काव्य संकलन प्रकाशित है.
प्रस्तुति : यादवेन्द्र

मंगलवार, सितंबर 06, 2011

मेरे वश में नहीं : निजार कब्बानी (प्रस्तुति : यादवेन्द्र)

निजार कब्बानी (1923 -1998 )
मेरे वश में नहीं
कि बदल पाऊं तुम्हारा रास्ता
या कि समझ ही पाऊं क्या चाहती हो तुम..
कभी भरोसा मत करो
कि कोई आदमी बदल सकता है किसी स्त्री को.
यह आदमी की खुशफहमी है
कि वो सोचता है उसने निर्मित की स्त्री
अपनी पसलियों के अंदर से...
स्त्री किसी आदमी की पसली से नहीं निकली
न निकलेगी कभी
ये तो आदमी ही है
जो निकलता है स्त्री की कोख के अंदर से
जैसे निकलती है मछली
सागर की अतल गहराइयों से
और जैसे निकलते हैं सोते नदियों से फूट कर
आदमी है कि चक्कर मारता रहता है
स्त्री की आँखों के सूरज के इर्द गिर्द
और मुगालते में रहता है
कि टिक कर खड़ा है स्थिर अपनी जगह पर ही
........
मुझमें कूबत नहीं कि
बाँध लूँ अपने साथ तुमको
या घरेलू बना लूँ तुम्हें
या साध लूँ तुम्हारी आदिम इच्छाएं...
यह पूरी तरह से ना मुमकिन काम है
मैंने अपना सारा सयानापन आजमा कर देख लिया
और अपना विस्मित मौन भी दाँव पर लगा के देख लिया
तुम्हारे ऊपर इनका कुछ भी असर नहीं
मेरी कोई सलाह/हिदायत भी कामयाब नहीं...
न ही प्रलोभन
तुम उतनी ही आदिम अनगढ़ बनी रहो
जितनी हो इस वक्त.
..........................
मेरी औकात नहीं कि बदल दूँ
तुम्हारी आदतें
जो बनीं तीस सालों में
ऐसी ही रहीं तुम दरमियान के
तीन सौ सालों में भी
बंद बोतल में उमड़ता रहा एक तूफ़ान
आदतन आदमी के बदन की गंध भांप लेने वाली स्त्री
लपकती है उस ओर आदतन ही
और उसको कब्जे में कर लेती है
आदतन
..............
कभी यकीन मत करो आदमी पर
कि अपने बारे में वो क्या कहता है
कि वो रचता है कवितायेँ
और पैदा करता है बच्चे...
दरअसल स्त्री है जो रचती है कवितायेँ
और आदमी उनपर लिख देता है अपना नाम
स्त्री है जो जानती है बच्चे
और आदमी अस्पताल के रजिस्टर में
दर्ज कर देता है नाम अपना
पिता के तौर पर.
..................
मैं नहीं बदल सकता तुम्हारा स्वभाव
मेरी किताबें तुम्हारे किसी काम की नहीं
और मेरे विचार बनाते नहीं तुम्हें कायल
न ही मेरी सयानी हिदायतों का कोई असर तुमपर
तुम तो अराजकता की मलिका हो
और उन्मत्तता की सिरमौर...
कोई कैसे तुमपर लगाये अंकुश
ऐसी ही रहो...
तुम नारीत्व का गदराया दरख़्त हो
जो फलता फूलता है अँधेरे में
न चाहिए उसको धूप और न ही पानी...
तुम सागरकन्या हो जिसको सभी मर्द प्रिय हैं
और कोई भी मर्द प्यारा नहीं
जो सोयी हर अदद आदमी के साथ
और सोयी नहीं किसी के भी साथ
तुम रेगिस्तान की घुमक्कड़ कबाइली स्त्री हो
जो हर एक कबीले के साथ घूमती फिरती है
पर जब भी लौटती है
तो लौटती कुँवारी ही है...
ऐसी ही रहो...बिलकुल ऐसी ही...

(अनुवाद एवं प्रस्तुति: यादवेन्द्र)

शुक्रवार, अगस्त 12, 2011

कैंसर क्या क्या नहीं कर सकता : एलिजाबेथ लुकास

एलिजाबेथ लुकास
( स्तन और किडनी के कैंसर पर विजय प्राप्त करने वाली)

कैंसर क्या क्या नहीं कर सकता

कैंसर इतना पिद्दी सा होता है
कि यह प्रेम को अपाहिज नहीं बना सकता
कि यह उम्मीदों को नेस्तनाबूद नहीं कर सकता
कि यह भरोसे को जंग लगा कर जर्जर नहीं कर सकता
कि यह शांति को नष्ट नहीं कर सकता
कि यह दोस्ती को हलाक़ नहीं कर सकता
कि यह स्मृतियों को दफना नहीं सकता
कि यह हिम्मत को गूँगा लाचार नहीं बना सकता
कि यह आत्मा पर विजय नहीं प्राप्त कर सकता
कि यह जीवन की अमरता चुरा नहीं सकता
कि यह जीवन जीने की ललक का ध्वंस नहीं कर सकता....
(प्रस्तुति : यादवेन्द्र)

बुधवार, मार्च 23, 2011

नाजिम हिकमत का वसीयतनामा : प्रस्तुति - यादवेन्द्र

नाजिम हिकमत ने जेल में रहते हुए अपनी पत्नी और बेटे के लिए ढेर सारी नायाब कवितायेँ लिखी हैं. कुछ समय पहले बेटे को लिखी ऐसी ही एक कविता मैंने साथी पंकज पाराशर के ब्लॉग khwabkadar.blogspot.com के लिए प्रस्तुत की थी.इसी कड़ी में यहाँ प्रस्तुत है बेटे के लिए लिखी गयी एक अन्य कविता :
(प्रस्तुति : यादवेन्द्र)
मैं इस वक्त एक किताब पढ़ रहा हूँ
तुम इसके अंदर घुस कर बैठे हो.
मैं एक गीत सुन रहा हूँ
तुम इसके अंदर भी विराजमान हो.
मैं रोटी खाने बैठा हूँ
तुम मेरे सामने बैठे साक्षात् दिख रहे हो.
मैं काम में जुट जाता हूँ
तुम कहीं से आ कर मेरे सामने बैठ जाते हो..
तुम हर जगह मौजूद हो
मेरे सर्वव्यापी प्यारे...
पर हम एक दूसरे से बात नहीं कर सकते
न ही हम एक दूसरे की आवाज सुन सकते हैं...
जैसे तुम मेरी विधवा हो
महज आठ साल की उम्र वाली.

मैंने हाल में नाजिम हिकमत की कवितायेँ पढ़ते हुए उनके बारे में ज्यादा से ज्यादा जानने की कोशिश कर रहा था तभी उनका वसीयतनामा पढने को मिला.इस विश्व कवि के लिखे इस मार्मिक पर अद्भुत दस्तावेज को पढ़ कर मैं इतना उत्तेजित हूँ कि इसे आप सब के साथ साझा करने से अपने को रोक नहीं पा रहा हूँ...

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कामरेड, यदि मैं उस दिन तक जीवित नहीं बचा....मेरा मतलब है कि देश को आज़ादी मिलने से पहले ही यदि मैं मर गया तो मुझे ले जा कर अनातोलिया के किसी गाँव की कब्रगाह में दफ़न कर देना.
हसन बे ने जिस मजदूर उस्मान को गोली से उड़ाने का हुकुम दिया था उसको मेरे बगल में एक तरफ और शहीद आयशा को दूसरी तरफ लिटा देना जिसने बच्चे को जन्म देने के चालीस दिन बाद दम तोड़ दिया था.
इस कब्रगाह के समीप से होकर सुबह के झुटपुटे में ट्रेक्टर निकलेंगे और गीत गूंजेंगे-वहां होंगे नए नए लोग बाग़,जले हुए पेट्रोल की गंध, दूर दूर तक फैले खेत,पानी से लबालब भरी नहरें और अकाल और आतंक से मुक्त उल्लास...
मैंने तो कागज पर उतारने से पहले ही गाये थे ऐसे गीत और ट्रेक्टरों के उत्पादन के नक़्शे बनें इस से पहले ही सूंघ ली थी जले हुए पेट्रोल की गंध...
मेरे पड़ोसियों--मजदूर उस्मान और शहीद आयशा-- को जीने की बहुत ललक थी,हांलाकि इसका भान शायद उन्हें ठीक से नहीं था...
कामरेड,यदि मैं उस दिन तक जीवित नहीं बचा--अब मेरे मन में ये धारणा धीरे धीरे जड़ जमाती जा रही है--तो मुझे ले जा कर अनातोलिया के किसी गाँव के कब्रिस्तान में दफ़न कर देना...यदि मेरे सिर से लगा कर कोई सीधा तना हुआ वृक्ष रोपा जा सके तो वहां रखने के लिए न तो मुझे पत्थर चाहिए ... न ही कुछ और...
(२७ अप्रैल १९५३,मास्को)