मेरे मित्रों की कविताएँ लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
मेरे मित्रों की कविताएँ लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, नवंबर 25, 2012

निष्पक्ष सिर्फ पत्थर हो सकता है: अशोक कुमार पाण्डेय













तुमने मेरी उंगलियाँ पकड़कर चलना सिखाया था पिता
आभारी हूँ, पर रास्ता मैं ही चुनूँगा अपना
तुमने शब्दों का यह विस्मयकारी संसार दिया गुरुवर
आभारी हूँ, पर लिखूँगा अपना ही सच मैं

मैं उदासियों के समय में उम्मीदें गढ़ता हूँ और अकेला नहीं हूँ बिल्कुल
शब्दों के सहारे बना रहा हूँ पुल इस उफनते महासागर में
हजारों-हजार हाथों में, जो एक अनचीन्हा हाथ है, वह मेरा है
हजारों-हजार पैरों में, जो एक धीमा पाँव है, वह मेरा है
थकान को पराजित करती आवाजों में एक आवाज मेरी भी है शामिल
और बेमकसद कभी नहीं होतीं आवाजें ...

निष्पक्ष सिर्फ पत्थर हो सकता है, उसे फेंकने वाला हाथ नहीं
निष्पक्ष कागज हो सकता है, कलम के लिए कहाँ मुमकिन है यह?

मैं हाड़-मांस का जीवित मनुष्य हूँ
इतिहास और भविष्य के इस पुल पर खड़ा नहीं गुजार सकता अपनी उम्र
नियति है मेरी चलना और मैं पूरी ताकत के साथ चलता हूँ भविष्य की ओर।

(अशोक कुमार पाण्डेय की यह खूबसूरत कविता आज दिनांक 25 नवम्बर 2012 के अमर उजाला में प्रकाशित हुई है, साभार। अशोक कुमार पाण्डेय का कविता संग्रह ‘लगभग अनामंत्रित’ प्रकाशित हो चुका है और चर्चा में है)

शुक्रवार, जुलाई 15, 2011

स्वामीनाथन का झल्ला: विशाल

विशाल की यह कविता उन दिनों की याद में जब हम मित्र मुजफ्फरनगर में स्वामीनाथन को लेकर एक कार्यक्रम आयोजित करने की तैयारी में थे। जे. स्वामीनाथन की कविताओं ने उनके चित्रों में एक नया संसार देखने का सूत्र हमें दिया। परिणाम यह हुआ कि कुछ ऐसी भावभूमि बनी कि कार्यक्रम का आयोजन मात्र औपचारिकता बनकर रह गया और स्वामीनाथन का झल्ला तो (बकौल तुलसी रमण, सम्पादक ‘विपाशा’) विशाल की कविता में आकर बैठ गया।
दृश्य: एक
दुनिया की उन
सभी प्यारी चीजों ने
अपने खत्म होते-होते ही
बना लिए थे घर
प्रतीकों में
जो अर्थां से छिपने की
कामयाब जगह मानी जाती है
बिन्दु में
जो कोई जगह तक नहीं घेरता
रेखाओं में
जिसकी कोई मोटाई तक नहीं होती
रंगों में
जो छिपकर लगातार बदलते हैं
अपने रंग
उन शब्दों में
जिन्हें अपने गलत इस्तेमाल का
डर नहीं होता
और जो निर्जीव पत्थर-से
ऐंठे पड़े रहते हैं
अक्सर तब भी
जब वे खूब गर्म हो रहे हों।

दृश्य: दो
दृश्य दो में दृश्य एक के
सभी विस्थापित आश्रय
सन्दर्भहीन सन्दर्भ में हैं
इसे गलत संदर्भ कहने का अधिकार
अभी आपको है मुझे नहीं

बेरोक-टोक छुट्टे घूम रहे
वाचाल असदंर्भित भालों की नोकों पर
अश्लील लिखावट में
नारों से लहराते हैं
सभी प्रतीक रंग रेखाएँ
और शब्द।

दृश्य: तीन
इस दृश्य का नायक -
एक दिन उसकी आह उठती है
गूँज बनने से पहले ही डूब जाती है

उसी की भीतरी घुटन में
और धड़कन एक धड़ाम में फटती है

अब दृश्य का नायक
गलत संदर्भ-सा टंगा है
संदर्भित दीवार पर।

दृश्य: चार
इस दृश्य में
तीनों दृश्यों के बाहर
ज. स्वामीनाथन का झल्ला बैठा है
जिसकी आँखों से सूरज अक्सर
चुरा ले आता है
चमकने का रहस्य।

* ज. स्वामीनाथन की कविताओं के लिए यहाँ क्लिक करें। विशाल की यह कविता ‘विपाशा’ के नवीनतम अंक में प्रकाशित हुई है। आभार।

मंगलवार, जनवरी 11, 2011

एक शाश्वत नृत्य इसी बासी पृथ्वी पर : अजेय

आर्कटिक वेधशाला में कार्यरत वैज्ञानिक मित्रों के कुछ नोट्स
अजेय भाई की की यह कविता हालाँकि थोड़ी गम्भीरता और कुछ ज्यादा धैर्य की अपेक्षा रखती है। लेकिन मुझे यह कविताबासी पृथ्वीकेतरोताज़ास्वर्ग में रूपान्तरित होने की सम्भावना से भरी लगती है, अपनी दयनीयता को चुनौती देती हुई औरनये नक्षत्रों की दूरियाँनाप पाने का भरोसा दिलाती हुई।


तुम्हारा नहीं होना
इस गुनगुनी धूपवाली सुबह
इस ठाठदारस्नो-रिज़ोर्टमें
तुम्हारा नहीं होना भी
एक विलास है
रोयेंदार कम्बल की सलवटों में डूबा हुआ
टटोलती रहती हैं जिसमें मेरी उंगलियाँ
उन खास चीजों को
रात भर साथ रहते हुए भी जो
सुबह अकसर नदारद होती हैं -
एक सुविधाजनक रिमोट बटन
एक सुकूनबख्श सिगरेट लाइटर
और तुम्हारी यादों को दर्ज करने वाली एक मुलायम पैंसिल
और जो पड़ी रहती है
सटी हुई आपस में
फिर भी अलग-अलग
छिटके हुए गुमशुदा
लगभग
कहाँ हो तुम ?

आज मैं उन तमाम चीजों के सैम्पल लूँगा
दिन निकलते ही जो
बरफ के क्रिस्टलों के बीच
बढ़ते दबाव और दुख की तमाम उम्र बताना शुरू कर देती हैं।

एक ज़िन्दा क्लोरोफिल की जिद में छिपी
मिट्टी के टुकड़ों की खोई हुई महक जाँचूँगा
और यह पता लगाने की कोशिश करूँगा
कि क्या तुम्हारे नहीं होने से ही
शुरू कर दिया था एक दिन
घुलना
उस पूरी हरियाली ने
लहरों ने, हवा ने
और मिट्टी ने
खो जाना
पानी में
और ठोस हो जाना ?

दोपहर तक
तुम्हारा नहीं होना
आद्र्रता के नहीं होने में तब्दील हो गया है
कि द्रवित और गतिशील अंतःकरण के बावजूद
यहाँ हर मौसम का है एक घनीभूत संस्तर
रूखा, कड़ा, ठहरा हुआ
एक मरियल सूरज जिसके क्षितिज में
अपनी पूरी ताकत से चमका है दिन भर
और शेष हो गया है
बिनी किसी के पिघलाए
बेहूदा कोहरे की संपीड़ित परतों में।

साँझ ढलने पर तुम्हारा नहीं होना
एक अलग ही भाव से शुक्र तारे का झिपझिपाना है
मेरे एकान्त को चिढ़ाते हुए
पृथ्वी के अन्तिम छोर पर
इस विराट टेलीस्कोप के अतिरिक्त
तुम्हें नाप लेने के और भी उपकरण हैं मेरे पास
एक से एक शक्तिशाली
छूट ही जाती है फिर भी
कोई एक अपरिहार्य रीडिंग
व्यर्थ हो जाता है दिन भर जुटाए गये आँकड़ों का परिश्रम
गड़बड़ा जाता है सारा समीकरण
रोशनदान के बाहर तैरती हुई
अँधेरी हवाओं के सुपुर्द कर आता हूँ चुपचाप
अपने संभावित आविष्कार की हजारों चिन्दियाँ।

एक शाश्वत नृत्य इसी बासी पृथ्वी पर
क्या तुम्हें पता था
झूमते रहते हैं देर रात तक
खूबसूरतनोर्देन लाइट्स
मटमैले ध्रुवीय आसमान पर
चलता रहता है उत्सव
शून्य से तीस डिग्री नीचे भी ?

इतनी सुन्दर है प्रकृति
और फैली हुई
क्षण-क्षण सैकड़ों रंगों और आकारों में
और भी फैलती हुई
अद्भुत है यह सब
और बला की दुर्लभ
बाहर निकलकर देखा है कभी ?

खोज पाता होगा सदियों में कोई एक
इस गुप्त उत्सव का रहस्य
जो चल रहा है लगातार
जो सुन नहीं पाते हम अपने ही शोर में
जो देख नहीं पाते हम अपने ही सपनों के कारण
आह ! क्या अनुभव है
जागते हुए
खुले में
सन्नाटे में यह सब देख जाना।

इस तरह से सिकुड़े हुए थे हम
कितने दयनीय
परत-दर-परत
बरफ की तरह
अपने दबावों में दबे हुए
बिछुड़े हुए
अपने-अपने गहरे खन्दकों की
अँधूरी भूलभुलैया में
दुबके, अकड़े हुए
जहाँ नरक है, नीचे
वहीं से नापनी थी हम सबको
नये नक्षत्रों की दूरियाँ
खोजनी थी नयी दुनिया

...कौन रुका रहना चाहता था ?
कौन ?

धूप सी बरसती थी
संतप्त हरहराती आकांक्षा
भाप सा उड़ जाता था
इस महान पृथ्वी का तरल सौन्दर्य
कि कूच पर जाना था ऐसे ही एक दिन
मुझे
तुम्हें
हम सबको
सहस्रों आकाशगंगाओं की तलाश में
इस वेधशाला से तेरह अरब प्रकाशवर्ष दूर
जैसे ही अवसर मिले

कौन रुका रहना चाहता था
इस बासी पृथ्वी पर ?
लेकिन ठहरो दोस्त
माफ करना
अपनी युटोपिया पर तुम्हारा पूरा-पूरा हक है
लेकिन मैं यहाँ खलल डालते हुए एक छोटी सी छूट लेना चाहता हूँ
क्या तुम अपने इस अत्याधुनिकडिवाइससे
महान आर्कटिक के काले आसमान पर
प्रक्षेपित कर सकते हो मुझे?
उन सुन्दर धु्रवीय प्रकाशों की पृष्ठभूमि पर
बार-बार उभारना चाहता हूँ
अपनी प्रतिछाया
बादल पर
बिजली और इन्द्रधनुषों की तरह
नाचना चाहता हूँ।

वेगवान तूफान
स्थिर जलमग्न हिमखंड !
उफनते समुद्र !
खामोश सितारो !
मेरे प्रिय साजिन्दो !!
आज की रात तुम खूब बजाना
दिल से
कि रूपान्तरित हो जाना है हम सबको
नाचते हुए
एक तरोताजा स्वर्ग में
इसी बासी पृथ्वी पर।