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सोमवार, जून 06, 2011

ईश्वर का समय का पहिया : शेल सिल्वरस्टीन


ईश्वर का समय का पहिया

ईश्वर ने मुस्कुरा कर मुझसे पूछा एक दिन :
क्या तुम थोड़ी देर के लिए ईश्वर बनना चाहोगे
जिस से मन माफिक चला सको दुनिया?
ठीक है, कोशिश करके देखता हूँ...मैंने जवाब दिया.
पर मुझे मिलेंगे कितने पैसे?
कितनी देर का लंच टाइम होगा?
नौकरी छोड़ने की कोई शर्त तो नहीं?
बेहतर है भाई कि तुम समय का पहिया मुझे कर दो वापिस
मुझे नहीं लगता कि तुम इसके काबिल हो अभी...
ईश्वर ने शांत भाव से जवाब दिया.

माँ और ईश्वर
ईश्वर ने हमें दीं उँगलियाँ -- माँ कहती हैं: फ़ॉर्क से खाना खाओ
ईश्वर ने दी हमें आवाज -- माँ कहती हैं: चीखो मत
माँ कहती हैं ब्रोकोली, अन्न और गाजर खाने को
पर ईश्वर ने तो हमें आईसक्रीम के स्वाद चखने को दिए.
ईश्वर ने दी हमें उँगलियाँ-- माँ कहती हैं: रुमाल का इस्तेमाल करो
ईश्वर ने हमें दिया कीचड़ कादो --माँ कहती हैं: इनमें छपछप मत करो
माँ कहती हैं:शोर मत मचाओ ,अभी पापा सो रहे हैं
पर ईश्वर ने हमें फोड़ने पिचकाने को ढेर सारे डिब्बे दिए हैं.
ईश्वर ने दी हमें उँगलियाँ-- माँ कहती हैं: अपने दस्ताने पहन कर रखो
ईश्वर ने हमें दी हमें बारिश की बूँदें: माँ कहती है: बरसात में भीगो मत
माँ चेताती है संभल के रहना,बहुत पास मत जाना
उन अजूबे प्यारे पिल्लों के जो ईश्वर ने हमें दिए.
ईश्वर ने दी हमें उँगलियाँ--माँ कहती हैं: जाओ इनको धो कर आओ
पर ईश्वर ने दिए हमें कोयले के ढेर और सुन्दर लेकिन गंदे शरीर
मैं बहुत सयाना तो नहीं हूँ पर एक बात निश्चित है:
या तो माँ सही होगी..या फिर ईश्वर.

शुक्रवार, फ़रवरी 11, 2011

खुश रहो...कि तुम अश्वेत हो : अनटोजाकी शांगगी

1948 में अमेरिका के एक मध्यम वर्गीय अश्वेत परिवार में जनमी अनटोजाकी शांगगी का मूल नाम तो पौलेट विलियम्स था पर 23 वर्ष की हुईं तो अपनी अश्वेत पहचान को रेखांकित करने के लिए उन्होंने अपना नाम बदल लिया---जुलू भाषा में इस नाम का शाब्दिक अर्थ होता है अपना साजो सामान ले कर शेर की तरह चलने वाला.अन्य अश्वेत कवियों की तरह उनको अपनी कविताओं को स्टेज पर प्रदर्शित करने में बहुत मजा आता है और इसके लिए उन्हें खूब ख्याति और सम्मान पुरस्कार भी मिले.कविताओं के अलावा उनकी ख्याति नाटक और उपन्यास लेखक के रूप में भी है.उनकी रचनाओं का मुख्य स्वर अश्वेत अस्मिता और स्त्री अधिकार की दिशा में जाता है. (चयन, प्रस्तुति एवं अनुवाद : यादवेन्द्र)




मेरे
पिता एक रिटायर्ड जादूगर हैं
मेरे पिता एक रिटायर्ड जादूगर हैं
इसी लिए तो मेरे बर्ताव में इतनी अनगढ़ता है
सब चीजें निकलती हैं
उनके जादुई हैट से
या बिना तल वाली बोतलों से
या फिर रंग बिरंगे तोतों के अंदर से...
ये सब इस कदर सहज होता है
जैसे कहीं से निकल आयें खरगोशों के कई जोड़े
या पचास सेंट के तीन सिक्के...
1958 में मेरे पिता ने जादूगरी से संन्यास ले लिया
और करने लगे दूसरा धंधा
हुआ यह कि तीसरे क्लास की मेरी एक दोस्त
एक दिन औचक ही कर बैठी उनसे फरमाईश...
आपके जादू में है ताकत तो आप मुझे इसी वक्त...
यहीं बना दो...काले से गोरा...
अब इस बेतुकी फरमाईश पर कोई खुद्दार अश्वेत
अमेरिकी करता भी तो क्या करता...
बोलते रहे यूँ ही अगड़म बगड़म
गिल्ली सिल्ली काली कलकत्ते वाली...
और ज्यों की त्यों रख दी चदरिया...
सच ये है कि जादूगरी पर भरोसा रखनेवाले अश्वेत बच्चे
बन जाते हैं राजनैतिक संकट
अपनी ही नस्ल के लिए.
मेरे पिता के हाथों की ताली से
नहीं बन सकता था कोई काले से गोरा
पलक झपकते...वहीँ बैठे बैठे.
मैं आज जितनी अनूठी दिखती हूँ
वो इस लिए कि मैं सीख रही हूँ पिता से
जादू की बारीकियां और तरकीबें...
इन दिनों मैं जो कुछ भी करती हूँ
जादू ही जादू होता है
और ये सब होता है खूब चटक रंग का
आप खुद देखिये कितना गहरा चटक रंग है ये
आप इनके साथ कुछ छेड़छाड़ की कोशिश मत करना...
मालूम है न
मैं ऐसे परिवार की हूँ जिसमें हैं कई
रिटायेर्ड जादूगर और भाग्यवाचक
जानते हो..अकेली नहीं हूँ मैं
चार करोड़ से ज्यादा रूहें और ग्रह नक्षत्र
संगठित होकर खड़े हैं मेरे साथ साथ.
मैं जरुर सुनूंगी तुम्हारी व्यथा कथा
मदद करुँगी जिस से सुधर जाये तुम्हारा
रोजगार,प्रेम,घर परिवार...
कर सकती हूँ ऐसे उपाय
कि स्वर्ग में तुम्हारी दादी और ज्यादा इज्जत के साथ
वास कर सकें...
तुम्हारी माँ सुगमता से
पार कर सकें मेनोपौज की मुश्किलें
और सुधर जाये तुम्हारा बेटा
करने लगे खुद ही अपने कमरे की सफाई.
हाँ...हाँ...हाँ...मन के अंदर धारण करो
कोई तीन इच्छाएं
सब के सब पूरी होंगी...
तुम्हारी लटों के लिए सुर्ख लाल रंग का रिबन
माच्चु पिच्चु का एक मिनिएचर चित्र.
संभव तो है सब कुछ
पर अपने होशो हवास में रहते हुए
कितनी भी नामी गिरामी क्यों न हो
कोई भी जादूगरनी
नहीं बना सकती तुम्हें गोरा...
यदि तुम गोरा होने पर ही आमादा हो
तो मुझे लगता है
तुम्हें दरकार होगी काले जादू की
मैं तो बना सकती हूँ तुम्हें भला और नेक
नेक और अश्वेत
और इसी तरह तुम जीवन भर बने रहोगे
अश्वेत ही
धीरे धीरे तुम्हें यही सब कुछ भाने लगेगा..
ऐसे ही अश्वेत बने रहना
जीवन भर
हाँ..अश्वेत बने रहना...
और खुश रहना इसी हाल में
खुश रहो...
कि तुम अश्वेत हो.

मंगलवार, जनवरी 18, 2011

सेसिलिया मिरेलेस (Cecilia Meireles) पुर्तगाली कविता

(1901 -1964) प्रसिद्ध ब्राजीली लेखक,कवि,नाटककार और शिक्षाशास्त्री नौ साल की अवस्था से कवितायेँ लिखना शुरू पर पहला संकलन छपने में पंद्रह वर्ष का विलम्ब.अनेक संकलन प्रकाशित.अनेक भाषाओँ में अनुवाद और खुद लोर्का,इब्सेन,रिल्के,पुश्किन और रबीन्द्र नाथ ठाकुर की रचनाओं के अनुवाद किये.बच्चों के लिए विपुल साहित्य रचा और ब्राजील में पहला बाल पुस्तकालय की स्थापना.१९५३ में भारत यात्रा और महात्मा गाँधी पर कविता लिखी...हिंदी और संस्कृत भी सीखी. कैंसर से मृत्यु .
अपना चित्र
मेरा चेहरा ऐसा तो बिलकुल नहीं था
जैसा आज दिख रहा है
इतना गुमसुम
इतना उदास
इतना मरियल
न ही इतनी खोखली थीं मेरी आँखें
और न मेरा मुंह था कभी भी इतना कसैला.
मेरे हाथ इतने शक्तिहीन नहीं थे
इतने सुस्त
इतने ठन्डे
और इतने मुर्दा तो नहीं थे कभी...
मुझे महसूस ही नहीं हुआ
कब हो गया इनमें इतना बदलाव
इतनी आसानी से
और निर्णायक
पलक झपकते सहज ही...
जाने किस दर्पण में
गुम हो गया मेरा चेहरा?

गिटार
तुम चाँदी के खंजर थे
हाँ,चाँदी के खंजर
पर तुम्हें कैसे ठहराऊं मैं
दोषी अपने हाथों को भरमाने का...
तुम्हें चमकते देखा मैंने
पत्थरों के बीच
चाँदी के खंजर
तुम्हारे हैंडिल पर खिल रहे थे मनमोहक फूल
और काया थी चिकनी साँचे में तराशी हुई
बिलकुल नापजोख कर गढ़ी हुई
चाँदी के खंजर
जिससे सीधे सीधे उतर जाएँ मेरे दिल के अंदर
देखते ही...बिना एक पल की देर किये हुए.
मेरे दिल का सबसे बड़ा दर्द क्या है
जानते हो चाँदी के खंजर...
कि देख नहीं सकती कैसे दम तोड़ रही हूँ मैं
पर जानती हूँ बखूबी
कि कौन क़त्ल कर रहा है मुझे.

गीत
मैं अपने सपनों को डालती हूँ एक जहाज में
और ठेल देती हूँ उसको सागर के अंदर
इसके बाद उलट पुलट करती हूँ मैं सागर
जिस से अतल गहराई में समा जाएँ मेरे सपने.
हाँ, मैं गुनगुनाती हूँ गीत
गीत ही हैं मेरे लिए सब कुछ
इसी से होता है रक्तसंचार निरंतर
और यही हैं अनछुई ऊँचाइयों तक उड़ने वाले लययुक्त पंख..
मुझे अच्छी तरह पता है
एक दिन मैं हो जाउंगी गूंगी और चेतनाशून्य
और गुनगुनाना नहीं होगा मेरे लिए मुमकिन.
- चयन और प्रस्तुति : यादवेन्द्र / ए-२४,शांति नगर,रूडकी

बुधवार, दिसंबर 15, 2010

औरतें : नाज़ी कवियानी (अनुवाद एवं प्रस्तुति : यादवेन्द्र)


इरान में जन्मीं नाज़ी कवियानी सैन फ्रांसिस्को में रहती हैं और एक ब्लॉग http://nazykaviani.blogspot.com चलाती हैंयहाँ प्रस्तुत है उनकी एक कविता (अनुवाद एवं प्रस्तुति : यादवेन्द्र)

औरतें

मेरे अंदर छुपी हुई है एक मासूम नन्हीं सी बच्ची
चटक नाक नक्श वाली और उम्मीदों से लबालब...
इसमें शोखी भरी चाल, ठहाकेदार हंसी और
हरदम थिरकने को आतुर टांगों वाली एक जवान स्त्री बसती है
कभी भनक नहीं लगती
कि उसके अंदर कितनी तेज बह रही है
नए नए लोगों और स्थानों को
देखने की उत्कट जिज्ञासा.
यहाँ एक कामोत्तेजक स्त्री रहती है
मोहपाश में फांस कर भरमा देनेवाली
प्रेमिका और आसक्त अनुरागी
स्पर्श के गहरे भेदों,आमंत्रणपूर्ण निगाहों और स्वागती चुम्बनों की
खूबसूरती परत दर परत उधेड़ने वाली स्त्री भी
रहती है मेरे अंदर.
निरंतर नितांत उदार,पालनहार और भरण पोषण करनेवाली माँ भी
रहती है मेरे शरीर के अंदर .
अनुभवी सयानी, अपने हुनर सिखाने को लालायित,
मुश्किल में दिलासा देने वाली
मार्गदर्शक और भविष्य निर्माता औरत
एकसाथ ही मैं सब कुछ हूँ.
एक प्रेमपगी भरोसेमंद साझेदार, करुणामयी और निष्ठावान पत्नी
सब कुछ समाया है एक मेरे ही भीतर.
मैं ये सब औरतें एकसाथ हूँ
और ये सब समाहित हैं मेरे अंदर एक साथ ही.
जब मैं कामोद्दीप्त दिखती हूँ
तब भी मेरे अंदर करवट लेती रहती है
एक मासूम नन्ही सी बच्ची.
जब मैं छोटी बच्ची दिखती हूँ
तब मेरे अंदर वास करती है एक माँ..
जब मैं जवान दिखती हूँ
तब मेरे अंदर करवटें लेती है
इतिहास की सारी की सारी समझदारी
मुझे इनमें से केवल एक रूप में कभी मत देखो
सिर्फ एक इकहरे रूप में किसी स्त्री को प्यार मत करो...
मेरे अंदर बसी हुई अनेकानेक स्त्रियों की
उपेक्षा अवहेलना कभी मत करो.
जब तुम सो जाते हो नींद में
पसीने से लथपथ
तृप्त संतुष्ट और भरे भरे
भूलना मत हमेशा याद रखना
कि मेरे अंदर बैठी हुई चटक नाक नक्श वाली बच्ची
मांग करेगी जिम्मेवार परवरिश की
मेरे अंदर की अनुभवी सयानी औरत
चाहेगी खुद के लिए भरपूर आदर सम्मान
मुझमें समायी हुई उद्यमी पोषक स्त्री को
सहज अपेक्षा रहेगी उचित कद्रदानी की
मेरे अंदर की जवान स्त्री ढूंढेगी
उन्मत्त करने वाला उत्तेजक उल्लास.
और मुझमें बैठे हुए साझेदार जीवनसाथी को
चाहिए होगा निष्कपट शुद्ध बर्ताव.
अब जब भी तुम आस पड़ोस की
30 ,40 ,50 या 60 साल की किसी स्त्री पर
दिल फेंक मोहित होने लगो
तो सबसे पहले उसके अंदर गहरे झांकना
वहां जरुर बैठी दिख जायेगी तुम्हे
एक मासूम नन्ही सी बच्ची...

गुरुवार, नवंबर 04, 2010

फूल को कुचल डालने का समय आ गया है : सिमीं बहबहानी

इरान की शेरनी के नाम से मशहूर 83 वर्षीय सिमीं बहबहानी आज के ईरानी काव्य जगत की सर्वाधिक सम्मानित कवियित्री हैं..अपने समय के खूब चर्चित और सम्मानित लेखक माता पिता की संतान सिमीं को बचपन से ही कविता लिखने का शौक लग गया और 14 साल में उनकी पहली कविता प्रकाशित हुई.उनके कई कविता संग्रह प्रकाशित हैं और पिछले वर्षों में दो बार साहित्य के नोबेल पुरस्कार के लिए उनका नाम प्रस्तावित हुआ.अपनी कविताओं में इरान के सामयिक हालातों और देश में स्त्रियों के ऊपर लगायी गयी पाबंदियों के विरोध में सिमीं बेहद मुखर रही हैं.देश की राष्ट्र कवि का दर्जा दिए जाने के बाद भी हाल में उन्हें देश से बाहर जाने की इजाज़त नहीं दी गयी--वजह थी वर्तमान शासन का लोकतान्त्रिक और रचनात्मक ढंग से विरोध करने वाले लेखकों फिल्मकारों के दमन की खुली मुखालफत। इरान में लोकतान्त्रिक आज़ादी को कुचलने की नीति का उन्होंने अपनी कविताओं में जम कर विरोध किया है,यहाँ प्रस्तुत है उनकी ऐसी ही एक बेहद चर्चित कविता :
(अनुवाद एवं प्रस्तुति : यादवेन्द्र)
फूल को कुचल डालने का समय आ गया है
फूल को कुचल डालने का समय आ गया है
अब और टाल मटोल मत करो
बस हाथ में थामो हंसिया
और दृढ कदमों से आगे बढ़ो..
देखो तो हरा भरा मैदान दूर दूर तक
ट्यूलिप के फूलों से लदा पड़ा है
आज तक देखी है किसी ने ऐसी निर्लज्ज ढिठाई
हरियाली अब भी शोखी से ऊपर ही ऊपर चढ़ती जा रही है..
समय आ गया है जब इनको
माथे से कस कर दबा दिया जाये.
मन के अंदर की ख़ुशी इतनी जाहिर हो रही है
कि हर शाख पर खिलते जा रहे हैं फूल
दिखावा..और वो भी इतना चटक रंग बिरंगा..
बिलकुल ही नहीं इसकी आज़ादी.
मैदान में फ़ौरन आ जाओ अपना खंजर लेकर
फूल की एक एक कोंपल को काट डालना है
जिससे सामने न कुछ दिखाई दे
और न ही मन में कोई ख्वाहिश पनप पाए.
देखन होगा
एक अदद कोंपल भी न बच पाए..
मुझे डर है कहीं पाँव न पसार ले
आत्ममोह अपना उलझाने वाला जंजाल
सुनहरे कटोरे या छह किनारे वाली तश्तरी का मोहक रूप धर कर..
इसको तुरंत रोकना होगा
जो कुल्हाड़ी है तुम्हारे पास संभाल कर रखी हुई
क्या होगा इसका इस्तेमाल
यदि काट ही न सको तेजी से बढ़ता ये लुभावना वृक्ष..
इस छतनार वृक्ष की किसी शाख पर
चौकस रहो, बैठ न जाये कोई परिंदा पल भर को भी.
मेरे गीतों और जंगली खुशबूदार झाड़ियों में
अंदर तक रचे बसे हैं संदेसे और सुगंध.
इनको कतई मौका मत दो
कि बढ़ा लें अपनापा और मेलजोल
आवारा गुन्जारों के साथ
और बन जाएँ विनाशकारी झंझावत.
मैं और मेरा दिल किसी हरे भरे मैदान से ज्यादा उर्वर है
और इसकी मामूली सी माटी और पानी में भी
पलक झपकते अंकुर की तरह फूट पड़ते हैं फूल ही फूल...
सबसे सुरक्षित यही है
कि मुझे सिर उठा कर खड़ा ही मत होने दो
यदि तुम दुश्मन हो बसंत के
सचमुच...सचमुच.

शनिवार, जुलाई 17, 2010

विलिअम स्टेनली मेरविन की कविताएँ


९२७ में जन्मे विलिअम स्टेनली मेरविन अमेरिका के १७ वें राजकवि (पोएटलोरिएट) चुने गए हैं।साठ के दशक में बेहद मुखर युद्ध (विएतनाम) विरोध के लिए तरह तरह की चर्चाओं में आये मेरविन दो बार कविता के लिए पुलित्ज़र पुरस्कार जीत चुके हैं जिसमें से पहला(१९७१) विएतनाम युद्ध विरोधी अभियानके लिए समर्पित कर दिया।बाद में उनका झुकाव बौद्ध दर्शन की ओर हुआ और इसके प्रभाव में उन्होंने हवाई द्वीप में अपना घर बना लिया...यहाँ रहते हुए प्रकृति के संरक्षण की उनकी चिंता ने मूर्त रूप लिया और वे खुद वर्षावन बचाने के काम में जुट गए।इस दौरान उनकी कविताओं में आधुनिक विकास के बर्बर अभियान के पैरों तले कुचली जा रही बिरासत बचाने की चिंता खूब मुखरहुई है। दो दर्जन से ज्यादा काव्य संकलनों के रचयिता मेरविन की इन्ही चिंताओं को व्यक्त करती हुई चार महत्वपूर्ण और चर्चित कविताएँ यहाँ प्रस्तुत हैं। (अनुवाद एवं प्रस्तुति : यादवेन्द्र पाण्डेय)


भाषा
आजकल हमारे इस्तेमाल में आ रहे अनेक शब्द ऐसे हैं जिन्हें हम दोबारा
कभी प्रयोग में नहीं लायेंगे...और न ही हम उन्हें कभी पूरी तरह से
विस्मृत कर पाएंगे.हमें उनकी दरकार है.. किसी चित्र के पृष्ठभाग की तरह
...जैसे हमारे शरीर में हो मज्जा..और रंग जीवित रहें हमारी रगों के
अन्दर.
हम अपनी निद्रा का चिराग जला कर रखते हैं उनकी राहों के बीचों बीच जिससे
ये सुनिश्चित कर पायें कि वे हाजिर हो जायेंगे जब तामील होगी गवाहों
की..कांपते थरथराते हुए ही सही..
हमें जब दफ़न किया जायेगा उनपर भी हमारे साथ ही डाली जाएगी मिट्टी
...पर वे फिर से उठ खड़े होंगे जब उठेंगे बाकी सब के सब.


अभ्यास
सब से पहले यह भूल जाओ
एक घंटे के लिए
कि समय क्या हुआ है
और इसका अभ्यास करना शुरू करो हर दिन.
इसके बाद यह भूलो कि कौन सा दिन है
इसका अभ्यास करते रहो हफ्ता भर
इसके पश्चात् यह भी स्मृति से निकल दो
कि विराजमान हो किस देश में
लोगों के साथ मिल कर
इसका भी रियाज़ करो हफ्ते भर तक.
फिर इन सब को एक साथ जोड़ कर
दुहराते जाओ एक हफ्ता
बीच बीच में थोड़ा विराम दे दे कर.

जब यह लगे कि साध लिया तुमने ये सब
तो जोड़ना और घटाना भूल जाओ
मान लो इनसे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला
ऐसे में जब एक हफ्ता गुजर जाए
तो कर डालो इनके क्रम में उलट फेर
इस तरह तुम्हारी स्मृति से चुपके से फिसल जाएगी गिनती.

भूल जाओ गिनती
और इसकी शुरुआत अपनी उम्र से करो
उलटी गिनती से करो
सम संख्याओं से करो
रोमन संख्याओं से करो
रोमन संख्याओं के भिन्नों से करो
पुराने पड़े कलेंडरों से करो
प्राचीन वर्णमालाओं की ओर लौटो
वर्णमालाओं तक लौटो तब तक
जबतक क्रमवार लगने न लगे
सब कुछ सहज पहले जैसा.

भूल जाओ तत्वों को
और इसका शुभारम्भ करो पानी से
इसके बाद चुनो धरती को
फिर पहुँचो आग तक...
यहाँ पहुँच कर आग को पहचानने से इनकार कर दो।


जैसे कोई तितली
ख़ुशी की बड़ी मुश्किल होती है उसका मौका
कुछ बताये बगैर ये अपने घेरे में ले सकती है मुझे
और जब तक चेतूँ ये अंतर्धान भी हो जा सकती है...
ये भी हो सकता है बिलकुल मेरे सामने ही खड़ी हो
और मुझे इसके पहचान न आये
मैं सोचता रह जाऊं किसी और बात की बाबत
यह दूसरा युग हो सकता है या कोई ऐसा इंसान
जिसे न तो बरसों बरस से मैंने देखा हो
और न ही देखने का सबब बने इस जीवन में...
ऐसा लगता है मुझे आह्लादित करने लगी है
ऐसी खुशियाँ जो मंडरा तो मेरे आसपास रही थीं
पर मैं उनसे वाकिफ नहीं था
हाँलाकि इर्द गिर्द होते हुए भी
मेरी पहुँच से बाहर हो सकती थीं वे
फिर इन्हें न तो पकड़ा जा सकता
न ही नाम ले कर पुकारा जा सकता
और न ही वापस बुलाया जा सकता गुहार लगा कर.

मैं अपनी दिली ख्वाहिशों की सुनने लगूँ
और रोक के बिठा लूँ अपने पास
तो मुमकिन है..यह ख़ुशी
हाँ...यही ख़ुशी
रूप बदल कर
बन जाए पीड़ा॥

भूली बिसरी भाषा
वाक्यों को पीछे छोड़ आगे बढ़ चुकी सांस
अब दुबारा कभी नहीं लौटेगी
फिर भी बड़े बूढ़े उन बातों को याद करते ही हैं
जिन्हें कह डालने की इच्छा घुमड़ती रही है उनके मन में
साल दर साल लगातार.

हांलाकि वे अब यह भांप गए हैं कि
लोग उन विस्मृत वस्तुओं का शायद ही यकीन करेंगे
और उन बचे खुचे शब्दों से जुडी तमाम वस्तुएं
बाती लेकर ढूंढे तो भी मिलेंगी कहाँ?

जैसे कोहरे में किसी अभिशप्त वृक्ष से सट कर खड़े होने की संज्ञा
या कि मैं के लिए क्रिया.
बच्चे उन मुहावरों को अब कभी नहीं दुहरा पायेंगे
जिन्हें बोलते बतियाते गुजर गए उनके माँ बाप
घडी घडी..दिन रात.

जाने किसने उन्हें घुट्टी पिला दी
कि हर बात को नए ढंग से कहने में ही
बेहतरी है आजकल
और इसी तरह उन्हें मिलेगी प्रशंसा और प्रसिद्धि
सुदूर देशों में..
जिन्हें कुछ पता ही नहीं हमारी चीजों के बारे में
ऐसे में उनसे भला कह ही क्या पाएंगे हम.

दरअसल हमें गलत और काला समझती है
नए आकाओं की शातिर निगाहें
कुछ समझ नहीं आता
क्या क्या बकता रहता है उनका रेडियो.
जब कभी दरवाजे पर होती है कोई आहट
सामने खड़ा मिलता है कोई न कोई अचीन्हा
सब जगह...कोनों अंतरों में
जहाँ तैरते होते थे हजार हजार चीजों के नाम
अब पसर गयी है झूठ की काली सी चादर .

कोई भी तो नहीं है यहाँ
जिसने अपनी आँखों देखा हुआ यह सब बदलते हुए
न ही आता है याद किसी को कोई खास वाकया
शब्दों को निर्मित ही इसलिए किया गया था
कि बताएं हमें संभावित परिवर्तनों के बारे में तफसील से...

देखो यही होंगे जरुर किसी कोने में पड़े हुए
वो पंख जिन्हें विलुप्त घोषित किया जा चुका
और यहीं तो कहीं होगी
हमारी खूब जानी पहचानी हुई वो मूसलाधार बारिश.