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शनिवार, मार्च 17, 2012

दिल्ली में चंद्रभागा

26 फरवरी 2012. प्रगति मैदान. सच ! उस दिन चंद्रभागा का पता उस दिन दिल्ली प्रगति मैदान का था क्योंकि उस दिन अजेय 'पैंतालीस डिग्री के कोण पर' अपने लैपटॉप में झांकते हुए,  'अपने जीने के ढंग' के साथ कविता सुना रहे थे. सही बात तो यह है कि मेले-ठेले से दूर गंगा, यमुना, कर्मनाशा, चंद्रभागा.... सभी 'पानी' से भरपूर नदियाँ कविता में बतकही का आनंद ले रही थीं. कवि अजेय की आँखों में उमड़ती चंद्रभागा को मैंने कई बार पढ़ा. बड़ा विलक्षण अनुभव था कविता में नदी की कलकल को सुनने का. मेरे साथ सिद्धेश्वर सिंह, अश्वनी खंडेलवाल, धीरेश सैनी, लीना मल्होत्रा... इस विलक्षण अनुभव के गवाह बने. 

अजेय की यह कविता उनके जन्मदिन (१८ मार्च) पर शुभकामनाओं सहित. 

बातचीत

ऐसे बेखटके शामिल हो जाने का मन थाउस बातचीत में जहाँ एक घोड़े वाला
और कुछ खानगीर  थे ढाबे के चबूतरों पर
ऐसे कि किसी को अहसास ही न हो


वहाँ बात हो रही थी
कैसे कोई कौम किसी दूसरे कौम से  अच्छा हो सकता है
और कोई मुल्क किसी दूसरे मुल्क से

कि कैसे जो अंगरेज थे
उन से अच्छे थे मुसलमान
और कैसे दोनो ही बेहतर थे हमसे

क्या अस्सल एका था बाहर के कौमों में
मतलब ये जो मुसल्ले बगैरे होते हैं
कि हम तो देखने को ही एक जैसे थे ऊपर से
और अन्दर खाते  फटे हुए

सही गलत तो पता नहीं हो  भाई,
हम अनपढ़ आदमी,  क्या पता ?
पर देखाई देता है साफ साफ
कि वो ताक़तवर है अभी भी

अभी भी जैसे राज चलता है हम पे
उनका ही— एह ! 
कौन गिनता है हमें
और कहाँ कितना गिनता है
डंगर  की तरह जुते हुए हैं  उन्ही की चाकरी में – एह !

तो केलङ से बरलचा के रास्ते में
जीह के ओर्ले तर्फ एक गग्गड़  मिलता है आप को
पेले तो क्या घर क्या पेड़ कुच्छ नहीं था
खाली ही तो था – एह !
अब रुळिङ्बोर केते कोई दो चार घर बना लिए हैं  
नाले के सिरे पे जो भी लाल पत्थर है
लाल भी क्या होणा अन्दर तो सुफेदै है
सब बाढ़ ने लाया है
एक दम बेकार
फाड़  मारो , बिखर जाएगा
कुबद का खान ऊपर ढाँक पर है
पहाड़ से सटा हुआ एक दम काला पत्थर
लक्कड़ जैसा मुलायम और साफ
काम करने को सौखा – एह !


बल्ती लोग थे तो मुसलमान
पर काम बड़ा पक्का किया
सब पानी का कुहुल
सारी पत्थर की घड़ाई
लौह्ल का सारा घर मे कुबद इन लोग बनाया
अस्सल जिम्दारी लौह्ल मे इन के बाद आया
बड़ा बड़ा से:रि इनो ही कोता --- एह !
और बेशक धरम तब्दील नही किया
जिस आलू की बात आज वो  फकर से करते हैं
पता है, मिशन वाले ने उगाया
पैले क्या था ?

और हमारा आदमी असान फरमोश
गदर हुआ तो नालो के अन्दर भेड़ बकरी की तरह काट दिया
औरत का ज़ेबर छीना
बच्चा मार दिया
ए भगवान
कितना तो भगा दिया बोला जोत लंघा के
देबी सींग ने
हमारा ताऊ ने
मुंशी साजा राम ने
सब रेम् दिल भलमाणस थे --- एह !

और बंगाली पंजाबी  साब भादर लोगों ने क्या किया
अंग्रेज से मिल कर
सब कीम्ती कीम्ती आईटम अम्रीका और लन्दन पुचाया
अजाबघ्रर बनाने के लिए – एह !

पेले भी हम ने कोई छोटे कारनामे नही किए
जब विलायत मे जंग अज़ीम  हुआ
जर्मन को यह मुलक खाली करने का फरमान हुआ
औने पौने मे चलता किया पादरी लोग को
सैंकड़ों बीघे दबा के बैठ गया 
ये सब तेज़ खोपड़ी
पटवारी अपणा मुंशी अपणा
तसिलदार को अंग्रेज़ अश्टंड की शय
बास्स्स जी ,   
ताक़त पास मे हो तो दमाग और भी तेज़ घूमता
बहुत तेज़ी से  और एकदम उलटा  
फिर हो गया  पूरा कौम बदनाम एकाध आदमी करके
एक मछली ,
सारा तलाप खन – खराप ,  एह !

और पत्थरों के बारे में जो बातें थीं
वो भी लगभग वैसी ही थीं
कि उन मे से कुछ दर्ज वाले होते हैं
और कुछ बिना दर्ज वाले होते हैं

कि परतें कैसे बैठी रहतीं हैं
एक पर एक चिपकी हुईं
कि कहाँ कैसी कितनी चोट पड़ने पर
दर्ज दिखने लग जाते हैं साफ – साफ
जैसा मर्ज़ी पत्थर ले आईए आप
और जहाँ तक घड़ाई की बात है
चाहे एक अलग् थलग दीवार चिननी हो
या  नया घर ही
या कुछ भी बनाना हो
दर्ज वाले पत्थर तो  बिल्कुल कामयाब नहीं हैं

आप ध्यान देंगे तो पता चलेगा
वह एक बिना दर्ज वाला पत्थर ही हो सकता है
जो गढ़ा जा सकता है मन मुआफिक़
कितने चाहे क्यूब काट लो उस के
और लम्बे में , मोटे में
कैसे भी डंडे निकाल लो
बस पहला फाड़ ठीक पड़ना चाहिए
और
बशर्ते कि मिस्त्री काँगड़े का हो – एह !

मिस्तरी तो कनौरिये भी ठीक हैं
कामरू का क़िला देखा है
बीर भद्दर वाला ?

अजी वो कनौरियों ने थोड़े बणाया
वो तो सराहणी रामपुरिए होणे

रेण देओ माहराज, काय के रामपुरिए
यहीं बल्हड़ थे सारे के सारे
सब साँगला में बस गए भले बकत में
रोज़गार तो था नहीं कोई
जाँह राजा ठाकर ले गया , चले गए – एह !

बुशैर का लाका है तो बसणे लायक , वाक़ई...... 

धूड़ बसणे लायक !
पूह तक तो बुरा ही हाल है
ढाँक ही ढाँक
नीचे सतलज – एह !

आगे आया चाँग- नको का एरिया
याँह नही बोलता  कनौरी में , कोई नहीं
सारे के सारे भोट आ कर बस गए  ऊपर से – एह !
बाँह की धरती भी उपजाऊ और घास भी मीठी

ञीरू से ले के ञुर्चा तक सब पैदावार
और पहाड़ के ऊपर रतनजोत – एह !

नीचे तो कुछ पैदा नहीं होता
और घास में टट्टी का मुश्क
हे भगवान ....
घोड़े को भी पूरा नहीं होता
पेड़ पर फकत चुल्ली और न्यूज़ा – एह !

कनौर वाला नही खाता अनाज , कोई नहीं
तब तो भाषा भी अजीब है
न भोटी में, न हिन्दी में;  अज्ज्ज्जीब  ही

पर भाई जी
सेब ने उनो  को चमका दिया है – एह !

हिमाचल मे जिस एरिया ने सेब खाया
देख लो
रंग ढंग तो चलो मान लिया
ज़बान ही अलग हो गई है !


सेब हमारे यहाँ था तो पहले से ही
पर जो बेचने वाला फल था
वह एक इसाई ले के आया था
ऐसा नही कि कुल्लू को सेब ने ही उठाया था
क्या क्या धन्दे थे कैसे कैसे
किस को मालूम नहीं ?

वो तो कोई गोकल राम था
जो पंडत नेहरू के ठारा बार पुकारने पे  भी
तबेले में छिपा रहा था
पनारसा  के निचली तरफ
और ठारा दिन उस की मशीन रुकी रही
पानी से चलती थी भले बकत में

लाहौर की बी ए थी अगले की
पर ज़मीर  के मारे बाहर नहीं आया
तो क़िस्मत भी बचारे की तबेले में बन्द हो गई

चुस्त लोगो ने सोसाटीयाँ  बणा के
ज़मीने कराई अपने नाम
आज मालिक बने हुए सब  
पलाट काट  के बेच रहा है
कलोनी खड़ी कर दी अगलो  ने
कौण पूछ सकता है ? 
और असल मे कुल्लू तो जिमदारों का था
हेंडलूम काँह से आया 
ऊपर का ब्यांगी – पशम  बास जी
सारी दस्तकारी जोलाह जात की – एह !
सब के सब कन्नौर से आए पूछ लो किसी से
छट्टनसेरी  से पतलीकूहल तक और इक्का दुक्का तो जाँह कहीं
गाँव के  गाँव बोलो  उठ के आ गए
अब ऐसा न भई जी ध्यात  मे  पूँजी तो थी नही
जो लाले थे पंजाबी और रफूजीयों के पास  धन होता था 
छिपा के लाया हुआ , चल गया कारोबार –एह !
ऊपर से जंगलाटी मे भी तर गए कुछ लोग
एक नम्बर भी , दो नम्बर भी
टिम्बर और भंग  बूटी
अब तो हॉटल टेक्सी का ज़माना है
बतहाशा पैसा  फैंक जाता है टूरिश्ट 
मैं केता हूँ कि लग्गे रेणा पड़्ता है

क्या पता कब दरवाज़ा खुल जाए – एह !

आखीर मे जब  वहाँ से चलने को हुआ  चुपचाप
तो तय था कि बातों की जो परतें थीं
वे तो हू ब हू  वैसी ही थीं
जैसी समुदायों , मुल्कों , पत्थरों, घोड़ों, धन्धों  और तमाम
ऐसी चीज़ों के होने व बने रहने की शर्तें थीं
एक के भीतर से खुलती हुई दूसरी
कहीं कहीं नज़र आ जाती कोई तीसरी भी
बारीकियों में छिपी हुई
जहाँ कोई जाना नही चाहता था
उन के वाचिक इतिहास को छोड़ कर

सच बात तो यह है कि
किसी भी बात को कह देने  के लिए आप को आवाज़ नहीं होना होता
जब कि परतों के भीतर का सच  सुनने के लिए आप को पूरा एक कान
और देख पाने के लिए आँख हो  जाना होता था

मुझे लगा कि यही  था वो अद्भुत समय
बात चीत के बारे बात करने का

कि एक ज़हनी दुनिया मे खर्च हो जाने से बचने के लिए
कितनी बड़ी नैमत है बातचीत ?

बेवजह भारी हुए बिना और बेमतलब अकड़े बिना
कड़क चा सुड़कते हुए,
अभी से तुम कहते रह  सकते हो अपनी  बातें
गलत सलत, टूटी फूटी जैसे भी
क्यों कि तय है , एक दिन तुम चुप हो जाने वाले हो

और अंतिम वाक्य सुना देता हूँ
जिसे छोड़ कर चले जाने का क़तई मन नहीं था --

इस दुआ सलाम और गप ठप से  बड़ा
सत्त नही होता ,  कोई नहीं, भई जी  
वैसे भी  इस धम्मड़ धूस  दुनिया के अन्दर  
उतने बड़े  सत्त  को ले के चाटणा है कि क्या  
जेह बता दो  तुम मेरे को  – एह ?

कुल्लू – 25.3.2011

मंगलवार, फ़रवरी 01, 2011

फूट आयीं कोंपलें हथियारों के जखीरों की कब्र पर : अश्वनी खण्डेलवाल

नन्ही मुँदी पलकों के पीछे
घुमाते हुए पुतलियाँ
तानकर लाल मुट्ठी हवा में
ले रहा है भरपूर अँगड़ाई
एक नवजात सपना।

कूदकर बिछौने से
दौड़कर जा बैठा
एवरेस्ट की चोटी पर
उठाकर कूची
भर दिये रंग
ठंडे सूरज में
खिल उठी सद्यस्नाता पृथ्वी
हरी धूप में भीगकर
खेलने लगे खो-खो
सारी दुनिया के बच्चे एक साथ

भरकर मुट्ठी में बादल
फेंककर मारा
सहारा के आसमान के चेहरे पर
खिलखिला उठी दामिनी
गुलाबी हो गया पूरा सहारा
कुलाँचे भरीं शावकों ने
पिया भर पेट पानी
पक्षियों ने गाये मल्हार।

ठुमक-ठुमक लगा आया चक्कर
दुनिया का
छुनन-छुनन, छुनन-छुनन बजी पैंजनियाँ
बलैयाँ लीं माँ ने
गुनगुनाने लगीं बंदनवार
झूमकर नाचे मंगलाचार
तंदूर ने किया कत्थक
आज कहीं भी, कोई भी भूखा नहीं सोया
फूट आयीं कोंपलें
हथियारों के जखीरों की कब्र पर।

हाथों में थामकर
एक नर्म-गर्म हाथ
टहला कुछ देर सागर की तली पर
रोंप आया प्रेम-मोती सीप की कोख में
टाँग आया अंतरिक्ष में कंदील
गाजापट्टी पर मिलीं गले
ईद और क्रिसमस।

श्श...ऽ...ऽ...ऽ...
शोर मत करो
यह कुनमुना रहा है।

* 1962 में जन्मे अश्वनी खण्डेलवाल की कविताएँ सात कवियों के संयुक्त कविता-संग्रहसदी का सचमें संकलितहैं। कुछ पुस्तकों का सम्पादन भी किया है। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित होती रहती हैं।
सम्पर्क: 22-प्रेमविहार, मुजफ्फरनगर।
Email : ashwani.khandelwal@rediffmail.com, M : 9837817608

गुरुवार, जनवरी 06, 2011

साधो! सवाल मूँछों का है : रमेश प्रजापति

साधो!
सवाल प्रेम का तो हरगिज़ नहीं मूँछों का है
जो बची रहनी चाहिए किसी भी क़ीमत पर

कमाल की हैं ये मूँछ भी साधो!
जो उगती है ठीक नाक के नीचे
जब भी सीधा खड़ा होकर कोई बाल
घुसने की जुर्रत करता है नथूनों में
तो छींक से डरकर भाग जाती है काली बिल्ली
काँपने लगते हैं प्रेम की टहनी पर खिले सपनों के फूल

‘ढाई आखर प्रेम’ की आँधी में
टेढ़ा न हो पाये घमंड़ की मूँछों का एक भी बाल
भले ही उड़ जाये जिन्दगी के टाट-टप्पर साधो!

बस इतना भर था उसका कसूर कि उसने
अपने प्रेम में पगी लड़की से प्रेम किया
जिसका हरजाना मूछों के वर्चस्व की पंचायत में
उसकी माँ और बहन की नंगी देह ने भुगता
और मौत की आगोश में सुला दिए जाते हैं प्रेमी-जोड़े

बित्ते भर की गलती पर
(जिसे गलती कहा भी जा सकता है या नहीं)
आज भी ये रौबदार मूँछें

रौंद देती हैं खेतों के बीच मजबूरों की अस्मिता
इस जनतंत्र में छटपटाता रहता है कानून
और सीधी तनी रहती हैं खाप की मूँछें

वर्चस्व की दीवारें हिलने लगी हैं लड़कियों की हँसी से
झोंपड़ियों के बीच से तमतमाता उग रहा है सूरज
हवा के रूख और ऋतुओं के बदलने के साथ ही
मौसम का तासीर भी पहचानो साधो!
पेड़ों की फुनगियों और उदास पगडंडियों पर
बिखर रहे हैं चाँदनी के फूल

जिस समय हत्याओं से थक जाएँगे तुम्हारे हाथ
यातनाघरों की टूटने लगेंगी रस्सियाँ
हाशिए की धमक से हिलने लगेंगी केन्द्र की चूलें
मूसलाधार बारिश में फीके पड़ने लगेंगे क्रूरताओं के पोस्टर
और कबीर के ढाई आखर से गमकने लगेंगे पोखर
उस दिन तनिक ठहरकर सोचना
कि यह कैसी आँधी उठ रही है क्षितिज से
समय का ऊँट बदल रहा है करवट
साधो! दुनिया खुलने लगी है हमारी तरफ
और हम नाक की परवाह किए बिना
कसकर पकड़े हुए हैं अपनी मूँछें

पंख फड़फड़ा रहा है घायल समाजवाद का फ़ाख़ता
कुलबुला रहीं हैं बरसों से काल कोठरी में बंद हवा
शिकारियों और काकरोचों की हँसी
चिपक गई है हलक में
साधो! परिवर्तन के नगाड़े से
फूली नहीं समा रही हैं दिशाओं की छातियाँ
और ढाक के तीन पात की तरह अभी भी
खोखली परम्पराओं का
ख़ौफ़नाक राग अलाप रही हैं घमंड़ी मूँछें।

गुरुवार, अगस्त 19, 2010

यह उन दिनों की बात थी: विशाल की कविता


यह उन दिनों की बात थी
जब मकान और बारिश में भीगी दीवारें
बोला करती थीं और
पेड़ों का तो कहना क्या

यह उन दिनों की बात थी जब
पशु-पक्षियों और मनुष्यों का सारा संसार
मटियाले स्मृति-टीलों पर
रंगों सा बिखरा था

यह उन दिनों की भी बात थी जब
जीवन का सोता
शब्दों के तटों से दूर-दूर बहता था
जे तटों के प्यासे बुलावे पर
अक्सर अपनी भीगी बयार भेजा करता था

यह उन दिनों की भी बात थी जब
धरती पर ठंडी हवा
बहते हुए प्यासे पानी के होठों को चूमकर
गर्म हो जाया करती थी

हाँ, यह उन दिनों की बात रही होगी जब
सूरज समय देखकर नहीं निकलता होगा और
रात
रात-भर रहस्य बुनती हुई
दिन की शान्त गोद में सो जाया करती होगी

यह उन दिनों की बात थी
जब धरती होगी
और उससे कहीं अधिक बड़ा कुछ
उसे घेरे रहा होगा

नहीं,
यह उन दिनों की भी बात थी
जब आसमान नहीं बँटा था
आसमान जो ऊपर में पसरा था
ठीक वैसा ही धान के खेत में डूबा था
और धरती अपने पेड़ों के हाथों से
आसमान के सर में गुदगुदी कुरेल किया करती होगी

यह उन दिनों की बात थी
कि धरती रही होगी
कभी !

विशाल युवा कवि एवं आलोचक हैं। एक कविता संग्रह ‘आज भी अनादि से’ प्रकाशित हो चुका है। मुजफ्फरनगर (उ.प्र.) में रहते हैं। साहित्य एवं आलोचना के गम्भीर अध्येता हैं। पूर्व मंे जनसत्ता एवं ‘राष्ट्रीय सहारा में अनेक आलेख प्रकाशित हो चुके हैं। ‘कथादेश’ के अगस्त अंक में हुसैन प्रसंग में उनका एक आलेख देखा जा सकता है।