बुधवार, जुलाई 14, 2010

रमेश प्रजापति की तीन कविताएँ

अच्छे दिन

अच्छे दिन
तैरते हैं झील की आँखों में
रंग-बिरंगे जलपाखी-से
चहकते हैं बाँसों के झुरमुट में
झिलमिलाते हैं सुहागिन की बिंदी में

जीवन के हरे-भरे जंगल में
फुदकते हैं खरगोश-से

सदियों तक
बसी रहती है खंडहरों में
अच्छे दिनों की गमक

चमकते हैं स्मृतियों की रेती में
शंख-सीपियों से
थिरकते हैं मोर के पंखों पर
टँके चाँद-सितारों-से

अचानक बतियाते हैं आकर
हरिया की झोंपड़ी में
रातभर

अच्छे दिन
झरते हैं माँ के सूनेपन में
झटकते हुए धूल से सनी
पिता की क़मीज़

तपती मरुभूमि में
बुरे दिनों की नागफनियों के सिर पर
मासूम फूल-से
खिलखिलाते हैं अच्छे दिन।

बुरे दिन

बुरे दिन
शहर की मनहूस जगह से
चमगादड़ से निकलकर
बो जाते हैं अँधेरा
जीवन के उजले चक में

बुरे दिनों की आहट पर
गौरैया-से
फुर्र हो जाते है अच्छे दिन
काँप उठती हैं पत्तियाँ
हवा की हर बात पर
सिर हिलाकर
हुँकारा देना बंद कर देते हैं पेड़
धरती के गाल पर
उमड़ उठती है आँसुओं की नदी

कभी-कभी
शुरू होते हैं बुरे दिन
सुहागिन का दर्पण टूटने से,
काली बिल्ली का रास्ता काटने से,
पूजा का दीया बुझने से,
बाहर जाते वक़्त पड़ोसी के टोकने से,
शनि, राहु ,........,
केतु की वक्र दृष्टि से

अच्छे दिनों की रोटी में
किरकिराते हैं बुरे दिन
फुटपाथ पर बैठा
टाँग हिलाता मज़दूर
चबा लेता है इन्हीं बुरे दिनों को
मुट्ठी भर भुने चनों-सा।

टुकड़ा-टुकड़ा सूरज

नदी-
बाँटकर पानी
लंबी यात्रा की थकान से
बैठ जाती है जाकर
समुद्र की गोद में

चींटियाँ-
बाँटकर शक्कर की तरह काम
भाँपकर बरसात की आहट
उठाकर अंडे
चली जाती हैं धरती की कोख में

पेड़
बाँटकर अपना सब कुछ
दानवीरों-से
हो जाते हैं अमर

दीवार
उठती है जो
बाँटती हुई आँगन
भालू की जीभ-सी
चाटती है मेरा अंतःकरण

सूरज-
चला आता है प्रतिदिन
तंदूरी रोटी-सा
परिंदों की चोंच में टँगा
और
बँट जाता है घर-घर में
टुकड़ा-टुकड़ा।

(
रमेश प्रजापति जाने-मने युवा कवि है. उनका एक कविता संग्रह 'पूरा हँसता चेहरा' शिल्पायन से प्रकाशित हो चुका है. दिल्ली में रहते है. अध्यापन करते है. उपरोक्त कविताओं में से 'अच्छे दिन' तथा 'बुरे दिन' कविताएँ परिकथा के पिछले अंक में प्रकाशित हुई हैं.)

सोमवार, जुलाई 12, 2010

पाब्लो नेरुदा के जन्मदिवस पर उनकी एक कविता

रुको ओ पृथ्वी

रुको ओ पृथ्वी
लौट आओ मेरे पास ओ सूरज
मेरी गंवई तकदीर के पास
पुराने जंगल की बारिश
वापस कर दो मुझे वह खुशबू और वे तलवारें
जो आसमान से गिरी थीं
पत्थर और चारागाह की निर्जन शान्ति
नदी के छोरों की नमी
देवदार के पेड़ की गंध
वह जीवन्त हवा जैसे एक दिल
ऊचे अराउकारिया* के
बेचैन झुंडों के बीच धड़कती हुई

ओ पृथ्वी
लौटा दो मुझे अपने खालिस तोहफे
खामोशी की वे मीनारें जो उठी थीं
अपनी जड़ों की महानता से
जाना चाहता हूँ वापस
वह बनने जो मैं नहीं हूँ
वापस जाकर उतनी गहराई से सीखने
चाहे तमाम प्राकृतिक चीजों के बीच
मैं जी सकूँ या न जी सकूँ: कोई बात नहीं
एक और पत्थर होना, वह काला पत्थर
वह खालिस पत्थर जिसे ले जाती है नदी अपने साथ।

( *अराउकारिया= चिली में पाया जाने वाला पेड़)

(यह कविता ‘साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित पाब्लो नेरुदा की कविताओं के संग्रह ‘रुको ओ पृथ्वी’ से साभार, जिसका अनुवाद श्री प्रभाती नौटियाल जी ने किया है।)

शनिवार, जुलाई 10, 2010

रेड इंडियन कविताएँ-3


जॉय हार्जो
जॉय हार्जो का जन्म ओक्लाहोमा के तुल्सा नामक स्थान पर सन् 1951 में हुआ। अनेक साहित्यक संस्थाओं व संगठनों से जुड़ीं जॉय हार्वो के ‘दि लोस्ट सांग’, ‘व्हाट मून ड्रोव मी टू दिस’, ‘रिमैम्बर’, ‘वूमैन हैंगिंग फ्रॉम दि थर्टीन्थ फ्लोर विंडो’, ‘इन मैड लव एंड वार’, ‘फिशिंग’, ‘दि वूमैन हू फैल फ्राॅम दि स्काइ’, ‘ए मैप टू द नैक्स्ट वल्र्ड’ और ‘शी हैड सम हार्सेस’ आदि प्रकाशित हो चुके हैं। अमरीकी मूल निवासियों के लोकगीतों में पंक्ति-विशेष की आवृत्ति से उत्पन्न अद्भुत प्रभाव का उनकी कविताओं में सुन्दर प्रयोग मिलता है। यहाँ प्रस्तुत है उनकी ‘शी हैड सम होर्सेस’ का अनुवाद।

उसके पास घोड़े थे कुछ
उसके पास घोड़े थे कुछ
उसके पास घोड़े थे जो ढांचे थे बालू के
उसके पास घोड़े थे जो नक्शे थे खींचे गये खून से
उसके पास घोड़े थे जो खोल थे सागर-जल के
उसके पास घोड़े थे जो नील पवन थे आकाश के

उसके पास घोड़े थे जो समूर और दांत थे
उसके पास घोड़े थे जो मिट्टी थे और सकते थे टूट
उसके पास घोड़े थे जो थे खंड-खंड बिखरी लाल चट्टान

उसके पास घोड़े थे कुछ।

उसके पास घोड़े थे जिनकी थीं लम्बी नुकीली छातियाँ
उसके पास घोड़े थे जिनकी थीं समूची भूरी जांघें
उसके पास घोड़े थे जो हँसते थे बहुत ज्यादा
उसके पास घोड़े थे जो फेंकते थे पत्थर शीशे के मकानों पर
उसके पास घोड़े थे जो चाटते थे रेजर की पत्तियाँ

उसके पास घोड़े थे कुछ।

उसके पास घोड़े थे जो नाचते थे अपनी माँ की बाहों में
उसके पास घोड़े थे जो सोचते थे कि सूरज थे वे और
चमकती थी उनकी काया दीप्त थे जो तारों की तरह
उसके पास घोड़े थे रात को नाचते थे जो चन्द्रमा पर
उसके पास घोड़े थे बहुत ही शर्मीले जो रहते थे खामोश
अपने ही बनाये थानों पर।

उसके पास घोड़े थे पसन्द थे जिन्हें क्रीक स्टाॅम्प के नाच-गीत
उसके पास घोड़े थे रोते थे जो अपनी बियर में
उसके पास घोड़े थे जो थूकते थे नर महारानियों पर जिन्होंने
डरा रखा था उन्हें अपने आपसे
उसके पास घोड़े थे जो कहते थे
वे नहीं थे भयभीत
उसके पास घोड़े थे जो बोलते थे झूठ
उसके पास घोड़े थे जिन्होंने कह दिया था सच,
नंगा कर जिनकी खींच ली गयी थीं जुबानें

उसके पास घोड़े थे कुछ।

उसके पास घोड़े थे जो कहते थे खुद को ‘घोड़ा’
उसके पास घोड़े थे जो कहते थे खुद को ‘बेताल’
जो छिपाकर रखते थे अपनी आवाजें खुद अपनी तईं
उसके पास घोड़े थे जिनके नहीं थे कोई नाम
उसके पास घोड़े थे जिनके पास थीं किताबें नामों की

उसके पास घोड़े थे कुछ।

उसके पास घोड़े थे फुसफुसाते थे जो अँधेरे में,
जो डरते थे बोलने से
उसके पास घोड़े थे जो खामोशी के डर से उठते थे चीख
जो रखकर चलते थे चाकू बचाए रखने के लिए खुद को प्रेतों से
उसके पास घोड़े थे प्रतीक्षा थी जिन्हें विनाश की
उसके पास घोड़े थे प्रतीक्षा थी जिन्हें पुनरुत्थान की

उसके पास घोड़े थे कुछ।

उसके पास घोड़े थे जो खड़े हो जाते थे घुटनों के बल सामने
किसी भी उद्धारक के
उसके पास घोड़े थे जिन्होंने की थीं कोशिशें उसे बचाने की
जो चढ़ गए थे उसके बिस्तर पर रात को जिन्होंने
की थीं प्रार्थनाएँ जब वे कर रहे थे उसके साथ बलात्कार

उसके पास घोड़े थे कुछ।

उसके पास घोड़े थे कुछ जिन्हें करती थी वह प्यार
उसके पास घोड़े थे कुछ जिन्हें करती थी वह नफरत
ये सब घोड़े थे एक सरीखे।

(ये रेड इंडियन कविताएँ 'रक्त में यात्रा' शीर्षक से पहल-पुस्तिका के रूप में प्रकाशित हैं। अनुवाद श्री वीरेंदर कुमारबरनवाल जी का है। पहल एवं बरनवाल जी के प्रति आभार व्यक्त करते हुए इन्हें पोस्ट कर रहा हूँ)

शुक्रवार, जुलाई 09, 2010

रेड इंडियन कविताएँ-2

बार्नी बुश
कवि, कथाकार और गायक बार्नी बुश का जन्म 1945 में शिकारियों के एक परिवार में हुआ। इनके पूर्वज ओहियो नदी के दोनों तटों पर निवास करते थे। उनके ‘इनहेरिट दि ब्लड’ सहित लगभग आधा दर्जन कविता-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। उनका मानना है कि ‘‘उस जीवन-शैली में जीना, जिसका प्रचार औपनिवेशिक अमेरिका विश्व भर में कर रहा है, वस्तुतः भीषण मृत्यु ही है, इसके पीछे चाहे उसकी कितनी ही भली नीयत क्यों न हो। इस सृष्टि के बचे हुए लोग उसे देखते हैं, सुनते हैं, सूँघते हैं, चखते हैं, महसूस करते हैं और डर जाते हैं। सभ्यता आज एक निहायत अश्लील शब्द बन गया है।’’

रक्त में यात्रा
जब बहुत दिन हो जाता है
देखे भाइयों को
जब बीत जाता है बहुत समय
देखे बहनों को
जब हो जाता है हमें काफी वक्त देखे
एक-दूसरे को, तब
देखने लगते हैं हम गहरे
अपने सपनों में उन्हें
जिन्होंने पैदा की है यह हालत
गीत, पहाड़, घास के हरे-भरे मैदान
नगारे, संबंधी, भालू, बारहसिंघे,
कछुए, गरुड़ और
हम देखते हैं
कितनी कुछ समेट लेने वाली है
सपनों की वर्तुलता
रक्त के बीच, कभी भी
समाप्त नहीं होती यात्रा।

(ये रेड इंडियन कविताएँ 'रक्त में यात्रा' शीर्षक से पहल-पुस्तिका के रूप में प्रकाशित हैं। अनुवाद श्री वीरेंदर कुमारबरनवाल जी का है। पहल एवं बरनवाल जी के प्रति आभार व्यक्त करते हुए इन्हें पोस्ट कर रहा हूँ)

बुधवार, जुलाई 07, 2010

रेड इंडियन कविताएँ-1

वेंडी रोज
आकलैंड, कैलीफोर्निया में 7 मई 1948 को जन्मी वेंडी रोज़ पिछले 25 बरसों से रेड इंडियन (मूल अमेरिकी) कविता का एक प्रमुख स्वर बनी हुई हैं। उनके एक दर्जन से अधिक कविता-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। अमेरिका के मूल निवासी - रेड इंडियंस को किसी तरह केवल संग्रहालय की वस्तु बना देने पर आमादा पश्चिम का विरोध उनकी कविता का मूल स्वर है।



त्रुगानिन्नी
तस्मानियन आदिम जाति की अंतिम जीवित सदस्या त्रुगानिन्नी ने अजायाबघर में भुसभरे अपने मढ़े हुए पति का शव देखा था। मरने के पहले उसने इच्छा व्यक्त की थी कि उसे मृत्यु के बाद उसके पिछवाड़े या समुद्र के किनारे दफन कर दिया जाए। वह नहीं चाहती थी कि उसकी अपनी लाश को भी अपने पति जैसी अपमानजनक स्थितियों से गुजरना पड़े। फिर भी मरने पर उसके शव को भी भुस भरकर और मढ़कर अस्सी वर्ष से अधिक अजायबघर में प्रदर्शन के लिए रखा गया।

तुम्हें आना होगा
थोड़ा और नजदीक
क्योंकि बहुत थोड़ी सी
बची है यह जुबान
और जो मैं कह रही हूँ
वह है महत्वपूर्ण।

मैं हूँ बस अंतिम
मैं जिसके स्तन रोते थे
सफेद कुहासे जिसने
देखे थे कितनी ही बेटियों को
मरते जिनके मुँह थे खाली
और गोल रुक गयी थीं
जिनकी साँस और
ढबरा गयी थीं जिनकी आँखें।

लो मेरे हाथ
साँवले को साँवले में
जैसे पीली मिट्टी
पिघलती हो धीमी-धीमी
धरती के प्यास की
सुनहरी आब पर,
मैं पिघल रही हूँ
पिछले सपनों में।

मुझे मत जाओ छोड़कर
क्योंकि मैं चाहती हूँ
बोलना और गाना
एक और गीत।

वे ले जाएँगे मुझे
आ गये हैं लो पहले ही
जबकि चल रही है अभी मेरी साँस
उन्हें प्रतीक्षा है मेरे अंत की,
मेरी मृत्यु की
हम आदिम लोग लेते हैं
कितना लंबा समय।

दया करो,
ले चलो मेरा शरीर
अंधकार के स्रोत की ओर
उस विराट काले रेगिस्तान में
जहाँ जनमे थे सपने
डाल दो मुझे पर्वत की
विशाल स्थूलता के नीचे या
सुदूर सागर में

रख दो मुझे वहाँ जहाँ वो
पा न सकें मुझको।

(ये रेड इंडियन कविताएँ 'रक्त में यात्रा' शीर्षक से पहल-पुस्तिका के रूप में प्रकाशित हैं। अनुवाद श्री वीरेंदर कुमारबरनवाल जी का है। पहल एवं बरनवाल जी के प्रति आभार व्यक्त करते हुए इन्हें पोस्ट कर रहा हूँ)

मंगलवार, जून 29, 2010

परमेन्द्र सिंह की कविता : जूता और पाँव



एक-
पाँव कब सफर करते हैं
सफर तो जूते करते हैं

कँटीले-पथरीले रास्तों पर
सबसे पहले
लहूलुहान होते हैं जूते ही।

करते हैं लगातार रक्षा
पाँवों की
योद्धा की ढाल की तरह।

जूते आते हैं
जूते जाते हैं
पर पाँव !
पाँव अमर हो जाते हैं।

दो-
जब भी गुस्से में
पटके जाते हैं पाँव
आहत होते हैं
जूते ही।

तीन-
अगर
सही नाप का न हो
जूता
तो बेडौल हो जाता है।

एक सक्षम जूता
रोकता है
पैर के अनुचित फैलाव को।

चार-
कदमताल मिलाते
चल पड़े हैं
शहर-भर के जूते
पाँव समेत
एक हाथी के पाँव का
जूता बनने।

पांच-
सपनो में
अक्सर डर जाते हैं अकेले पाँव
क्योंकि
जूता उस वक्त साथ नहीं होता।

सोमवार, जून 21, 2010

जे. स्वामीनाथन की कविताएँ



(चित्रकार के रूप में ख्यातिप्राप्त जे.स्वामीनाथन की कविताएँ ‘विपाशा’ के सितम्बर-अक्तूबर 94 में प्रकाशित हुई थीं। आज उनके जन्मदिन पर उन्हें स्मरण करते हुए यह पोस्ट.....आज जब सिंथेटिक सी लगने वाली कविताएँ प्लास्टिक के खिलौनों की तरह फैक्टरी से धड़ाधड़ निकल रही हैं, जे. स्वामीनाथन की ये कविताएँ आदिम गंध के कारण अपनी उपस्थिति लगातार बनाए हुए हैं। )

गाँव का झल्ला
हम मानुस की कोई जात नहीं महाराज
जैसे, कौवा कौवा होता है, सुग्गा सुग्गा
और ये छितरी पूँछ वाले अबाबील अबाबील
तीर की तरह ढाक से घाटी में उतरता बाज, बाज
शेर शेर होता है, अकेला चलता है

सियार, सियार
बंदर सो बंदर, और कगार से कगार पर
कूद जाने वाला काकड़ काकड़
जानवर तो जानवर सही
बनस्पति भी अपनी-अपनी जात के होते हैं
कैल कैल है, दयार दयार
मगर हम मानुस की कोई जात नहीं
आप समझे न
मेरा मतलब इससे नहीं कि ये मंगत कोली है
मैं राजपूत
और वह जो पगडंडी पर छड़ी टेकता
लंगड़ाता चला आ रहा है इधर
बामन है, गाँव का पंडत
और आप, आपकी क्या कहें
आप तो पढ़े-लिखे हो महाराज
समझे न आप, हम मानुस की कोई जात नहीं
हम तो बस, समझें आप
कि मुखौटे हैं, मुखौटे
किसी के पीछे कौवा छुपा है
तो किसी के पीछे सुग्गा
सियार भतेरे, भतेरे बंदर
और सब बच्चे काकड़ काकड़या हरिन, क्यों महाराज
शेर कोई कोई, भेड़िये अनेक
वैसे कुछ ऐसे भी, जिनकी आँखों में कौवा भी देख लो
सियार भी, भेड़िया भी
मगर ज़्यादातर मवेशी
इधर उधर सींगें उछाल
इतराते हैं
फिर जिधर को चला दो, चल देते हैं
लेकिन कभी-कभी कोई ऐसा भी टकराता है
जिसके मुखौटे के पीछे, जंगल का जंगल लहराता है
और आकाश का विस्तार
आँखों से झरने बरसते हैं, और ओंठ यों फैलते हैं
जैसे घाटी में बिछी धूप
मगर वह हमारी जात का नहीं
देखा न मंदर की सीढ़ी पर कब से बैठा है
सूरज को तकता, ये हमारे गाँव का झल्ला।


पुराना रिश्ता
परबत की धार पर बाहें फैलाए खड़ा है
जैसे एक दिन
बादलों के साथ आकाश में उड़ जाएगा जंगल
कोकूनाले तक उतरे थे ये देवदार
और आसमान को ले आए थे इतने पास
कि रात को तारे जुगनू से
गाँव में बिचरते थे
अब तो बस
जब मक्की तैयार होती है
तब एक सुसरा रीछ
पास से उतरता है
छापेमार की तरह बरबादी मचाता है
अजी क्या तमंचे, क्या दुनाली बंदूक
सभी फेल हो गये महाराज
बस, अपने ढंग का एक ही, बूढ़ा खुर्राट
न जाने कहाँ रह गया इस साल


सेव और सुग्गा
मैं कहता हूँ महाराज
इस डिंगली में आग लगा दो
पेड़ जल जाएँगे तो कहाँ बनाएँगे घांेसले
ये सुग्गे
देखो न, इकट्ठा हमला करते हैं
एक मिनट बैठे, एक चोंच मारा और गये
कि सारे दाने बेकार
सुसरों का रंग कैसा चोखा है लेकिन
देखो न
बादलों के बीच हरी बिजली कौंध रही है
भगवान का दिया है
लेने दो इनको भी अपना हिस्सा
क्यों महाराज ?


दूसरा पहाड़
यह जो सामने पहाड़ है
इसके पीछे एक और पहाड़ है
जो दिखायी नहीं देता
धार-धार चढ़ जाओ इसके ऊपर
राणा के कोट तक
और वहाँ से पार झाँको
तो भी नहीं
कभी-कभी जैसे
यह पहाड़
धुध में दुबक जाता है
और फिर चुपके से
अपनी जगह लौटकर ऐसे थिर हो जाता है
मानों कहीं गया ही न हो
- देखो न
वैसे ही आकाश को थामे खड़े हैं दयार
वैसे ही चमक रही है घराट की छत
वैसे ही बिछी हैं मक्की की पीली चादरें
और डिंगली में पूँछ हिलाते डंगर
ज्यों के त्यों बने हैं, ठँूठ सा बैठा है चरवाहा
आप कहते हो, वह पहाड़ भी
वैसे ही धुंध में लुपका है, उबर आयेगा
अजी ज़रा आकाश को तो देखो
कितना निम्मल है
न कहीं धुंध, न कोहरा, न जंगल के ऊपर अटकी
कोई बादल की फुही
वह पहाड़ दिखायी नहीं देता महाराज
उस पहाड़ में गूजरों का एक पड़ाव है
वह भी दिखायी नहीं देता
न गूजर, न काली पोशाक तनी
कमर वाली उनकी औरतें
न उनके मवेशी न झबड़े कुत्ते
रात में जिनकी आँखें
अंगारों सी धधकती हैं
इस पहाड़ के पीछे जो वादी है महाराज
वह वादी नहीं, उस पहाड़ की चुप्पी है
जो बघेरे की तरह घात लगाये बैठा है।


जलता दयार
झींगुर टर्राने लगे हैं
और खड्ड में दादुर
अभी हुआ-हुआ के शोर से
इस चुप्पी को छितरा देंगे सियार
ज़रा जल्दी चलें महाराज
यह जंगल का टुकड़ा पार हो जाये
फिर कोई चिंता की बात नहीं
हम तो शाट-कट से उतर रहे हैं
वर्ना अब जंगल कहाँ रहे
देखा नहीं आपने
ठेकेदार के उस्तरे ने
इन पहाड़ों की मुंडिया किस तरह साफ कर दी
डर जानवरों का नहीं महाराज
वे तो खुद हम आप से डरकर
कहीं छिपे पड़े होंगे
डर है उस का
उस एक बूढ़े दयार का
जो रात के अँधेरे में कभी-कभी निकलता है
जड़ से शिखर तक
मशाल सा जल उठता है
एक जगह नहीं टिकता
संतरी की तरह इस जंगल में गश्त लगाता रहता है
उसे जो देख ले
पागल कुत्ते के काटे के समान
पानी के लिए तड़प-तड़पकर
दम तोड़ देता है
ज़रा हौसला करो महाराज
अब तो बस, बीस पचास कदम की बात है
वह देखो उस सितारे के नीचे
बनिये की दूकान की लालटेन टिमटिमा रही है
वहाँ पहुँचकर
घड़ी भर सुस्ता लेंगे।


मनचला पेड़
बीज चले रहते हैं हवा के साथ
जहाँ गिरते हैं हम जाते हैं ढीठ
बिरक्स बन जाते हैं
और टिके रहते हैं कमबख्त
बगलों की तरह, या कि जोगी हैं महाराज
आज तो आकाश निम्मल है
पर पार साल
पानी ऐसा बरसा कि पूछो मत
हम पहाड़ के मानुस भी सहम गये
एक रात
ढाक गिरा और उसके साथ
हमारा पंद्रह साल बूढ़ा रायल का पेड़
जड़ समेत उखड़कर चला आया
धार की ऊँचाई से धान की क्यार तक
(अब जहाँ खड़ा था वहाँ तुझे तकलीफ थी
यार बोरड़ खा गये थे बेवकूफ)
सेटिंग ठीक होने पर दस पेटी देता था, दस
मैं तो सिर पीटकर रह गया मगर
लंबरदारिन ने नगाड़े पर दी चोट पर चोट
इकट्ठा हो गया सारा गाँव
गड्ढा खोदा, रात भर लगे रहे पानी में
और खड़ा किया मनचले को नये मुकाम पर
अचरज है, सुसरा इस साल फिर फल से लदा है


कौन मरा
वह आग देखते हो आप
सामने वह जो खड्ड में पुल बन रहा है
अरे, नीचे नाले में वह जो टरक ज़ोर मार रहा था
पार जाने के लिए
ठीक उसकी सीध में
जहाँ वह बेतहाशा दौड़ती, कलाबाजियाँ खाती
सर धुनती नदिया
गिरिगंगा में जा भिड़ी है
वहीं किनारे पर है, हमारे गाँव का श्मशान
ऊपर पुड़ग में या पार जंगल के पास
मास्टर के गाँव में
या फिर ढाक पर ये जो दस-बीस घर टिके हैं

या अपने ही इस चमरौते में
जब कोई मानुस खत्म हो जाता है
तब हम लोग नगाड़े की चोट पर
उसे उठाते हुए
यहीं लाते हैं, आग के हवाले करते हैं
लेकिन महाराज
न कोई खबर न संदेसा
न घाटी में कहीं नगाड़े की गूँज
सुसरी मौत की सी इस चुप्पी में
यह आग कैसे जल रही है।
(पोस्ट में प्रकाशित सभी चित्र ललित कला अकादमी के कैटेलोग से साभार)