बुधवार, मई 25, 2011

सन्तोष कुमार वर्मा की कविताएँ

संज्ञान
फूल, प्रेमपत्र, सुगंध
लिखने को बनी कलम
खुद-ब-खुद जब उतारने लगे
रक्त, आग और गालियाँ पन्नों पर
तब उँगलियों को चाहिए -
कलम छोड़कर
मुट्ठी बन जाएँ।

बिजूका

खेत में जो बिजूका है
जो डरता है, डरे
जो हों दुस्साहसी, चालबाज
खेत चरें।

नपुंसक बिजूका
कुछ शांतिप्रिय कबूतरों
और बुलबुलों की ओर
अपनी कलूटी खोपड़ी पर उगी
कुटिल आँखें तरेरता है।

छुट्टे साँडों और
मदमस्त हाथियों के स्वागत में
‘अतिथि देवो भव’ उवाचता बिजूका
अपनी बाँहें क्षैतिज पसारे
रौंद दिये गये खेत से
आँखें फेरता है।

कौए की सामूहिकता
सड़क पर
गंदा पानी फैल रहा है
मैं अपना दरवाजा
और ऊँचा कर लूँगा।

पड़ोसी का बेटा ड्रग्स लेता है
कोई बात नहीं
अपना मुन्ना तो नशेड़ी नहीं।

शहर में दंगे के आसार हैं
यहीं मैं बहुसंख्यक हूँ।

रिक्शा वाला पूरे पैसे माँग रहा था
पिट रहा है
हमें क्या पड़ी
किसी के फटे में टाँग फँसाने की।

सरे-राह लड़की गायब हो गयी
मेरी बहन तो घर में होगी।

गाँधी के तीनों बंदर
आज हमारे शागिर्द होते।

जरा एक कौआ मार के
आँगन में टाँग दो
और देखो मजा।


(सन्तोष के परिचय में केवल इतना ही कि वे पेशे से डिप्टी जेलर हैं और उनकी ये कविताएँ सरकारी नौकरी में आने से पहले लिखी गयी हैं।)

4 टिप्‍पणियां:

  1. इस सोच का व्‍यक्ति सार्वजनिक जिम्‍मेदारी के पद पर है, अच्‍छी बात है.

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  2. अच्छा किया जो बरसों बाद इन्हें फिर पढवा दिया. अब संतोष कुमार वर्मा की नई कवितायेँ पढवाने की जिम्मेदारी भी आपकी है. और क्या कलम और जनसंघर्ष में भागीदारी साथ-साथ भी हो सकती है या मुट्ठी बंद करने के लिए कलम छोड़ना ही पड़ता है...

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  3. कविताएं बहुत कुछ कहती हैं।

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