शुक्रवार, अगस्त 12, 2011

कैंसर क्या क्या नहीं कर सकता : एलिजाबेथ लुकास

एलिजाबेथ लुकास
( स्तन और किडनी के कैंसर पर विजय प्राप्त करने वाली)

कैंसर क्या क्या नहीं कर सकता

कैंसर इतना पिद्दी सा होता है
कि यह प्रेम को अपाहिज नहीं बना सकता
कि यह उम्मीदों को नेस्तनाबूद नहीं कर सकता
कि यह भरोसे को जंग लगा कर जर्जर नहीं कर सकता
कि यह शांति को नष्ट नहीं कर सकता
कि यह दोस्ती को हलाक़ नहीं कर सकता
कि यह स्मृतियों को दफना नहीं सकता
कि यह हिम्मत को गूँगा लाचार नहीं बना सकता
कि यह आत्मा पर विजय नहीं प्राप्त कर सकता
कि यह जीवन की अमरता चुरा नहीं सकता
कि यह जीवन जीने की ललक का ध्वंस नहीं कर सकता....
(प्रस्तुति : यादवेन्द्र)

रविवार, जुलाई 24, 2011

राजेश रेड्डी की ग़ज़लें



1

शाम को जिस वक्त खाली हाथ घर जाता हूँ मैं
मुस्कुरा देते हैं बच्चे और मर जाता हूँ मैं

जानता हूँ रेत पर वो चिलचिलाती धूप है
जाने किस उम्मीद में फिर भी उधर जाता हूँ मैं

सारी दुनिया से अकेले जूझ लेता हूँ कभी
और कभी अपने ही साये से भी डर जाता हूँ मैं

ज़िन्दगी जब मुझसे मजबूती की रखती है उमीद
फैसले की उस घड़ी में क्यूँ बिखर जाता हूँ मैं

आपके रस्ते हैं आसाँ, आपकी मंजिल करीब
ये डगर कुछ और ही है जिस डगर जाता हूँ मैं

2
मिट्टी का जिस्म लेके मैं पानी के घर में हूँ
मंज़िल है मेरी मौत, मैं हर पल सफ़र में हूँ

होना है मेरा क़त्ल ये मालूम है मुझे
लेकिन ख़बर नहीं कि मैं किसकी नज़र में हूँ

पीकर भी ज़हरे-ज़िन्दगी ज़िन्दा हूँ किस तरह
जादू ये कौन-सा है, मैं किसके असर में हूँ

अब मेरा अपने दोस्त से रिश्ता अजीब है
हर पल वो मेरे डर में है, मैं उसके डर में हूँ

मुझसे न पूछिए मेरे साहिल की दूरियाँ
मैं तो न जाने कब से भँवर-दर-भँवर में हूँ

3
मेरी ज़िंदगी के मआनी बदल दे
खु़दा इस समुन्दर का पानी बदल दे

कई बाक़ये यूँ लगे, जैसे कोई
सुनाते-सुनाते कहानी बदल दे

न आया तमाम उम्र आखि़र न आया
वो पल जो मेरी ज़िंदगानी बदल दे

उढ़ा दे मेरी रूह को इक नया तन
ये चादर है मैली- पुरानी, बदल दे

है सदियों से दुनिया में दुख़ की हकूमत
खु़दा! अब तो ये हुक्मरानी बदल दे

शुक्रवार, जुलाई 15, 2011

स्वामीनाथन का झल्ला: विशाल

विशाल की यह कविता उन दिनों की याद में जब हम मित्र मुजफ्फरनगर में स्वामीनाथन को लेकर एक कार्यक्रम आयोजित करने की तैयारी में थे। जे. स्वामीनाथन की कविताओं ने उनके चित्रों में एक नया संसार देखने का सूत्र हमें दिया। परिणाम यह हुआ कि कुछ ऐसी भावभूमि बनी कि कार्यक्रम का आयोजन मात्र औपचारिकता बनकर रह गया और स्वामीनाथन का झल्ला तो (बकौल तुलसी रमण, सम्पादक ‘विपाशा’) विशाल की कविता में आकर बैठ गया।
दृश्य: एक
दुनिया की उन
सभी प्यारी चीजों ने
अपने खत्म होते-होते ही
बना लिए थे घर
प्रतीकों में
जो अर्थां से छिपने की
कामयाब जगह मानी जाती है
बिन्दु में
जो कोई जगह तक नहीं घेरता
रेखाओं में
जिसकी कोई मोटाई तक नहीं होती
रंगों में
जो छिपकर लगातार बदलते हैं
अपने रंग
उन शब्दों में
जिन्हें अपने गलत इस्तेमाल का
डर नहीं होता
और जो निर्जीव पत्थर-से
ऐंठे पड़े रहते हैं
अक्सर तब भी
जब वे खूब गर्म हो रहे हों।

दृश्य: दो
दृश्य दो में दृश्य एक के
सभी विस्थापित आश्रय
सन्दर्भहीन सन्दर्भ में हैं
इसे गलत संदर्भ कहने का अधिकार
अभी आपको है मुझे नहीं

बेरोक-टोक छुट्टे घूम रहे
वाचाल असदंर्भित भालों की नोकों पर
अश्लील लिखावट में
नारों से लहराते हैं
सभी प्रतीक रंग रेखाएँ
और शब्द।

दृश्य: तीन
इस दृश्य का नायक -
एक दिन उसकी आह उठती है
गूँज बनने से पहले ही डूब जाती है

उसी की भीतरी घुटन में
और धड़कन एक धड़ाम में फटती है

अब दृश्य का नायक
गलत संदर्भ-सा टंगा है
संदर्भित दीवार पर।

दृश्य: चार
इस दृश्य में
तीनों दृश्यों के बाहर
ज. स्वामीनाथन का झल्ला बैठा है
जिसकी आँखों से सूरज अक्सर
चुरा ले आता है
चमकने का रहस्य।

* ज. स्वामीनाथन की कविताओं के लिए यहाँ क्लिक करें। विशाल की यह कविता ‘विपाशा’ के नवीनतम अंक में प्रकाशित हुई है। आभार।

बुधवार, जुलाई 13, 2011

नये इलाके में: अरुण कमल

इन नये बसते इलाकों में
जहाँ रोज बन रहे हैं नये-नये मकान
मैं अक्सर रास्ता भूल जाता हूँ

धोखा दे जाते हैं पुराने निशान
खोजता हूँ ताकता पीपल का पेड़
खोजता हूँ ढहा हुआ घर
और जमीन का खाली टुकड़ा जहाँ से बायें
मुड़ना था मुझे
फिर दो मकान बाद बिना रंग वाले लोहे के फाटक का
घर था इकमंजिला

और मैं हर बार एक घर पीछे
चल देता हूँ
या दो घर आगे ठकमकाता

यहाँ रोज कुछ बन रहा है
रोज कुछ घट रहा है
यहाँ स्मृति का भरोसा नहीं
एक ही दिन में पुरानी पड़ जाती है दुनिया
जैसे वसन्त का गया पतझड़ को लौटा हूँ
जैसे बैशाख का गया भादों को लौटा हूँ

अब यही है उपाय कि हर दरवाजा खटखटाओ
और पूछो -
क्या यही है वो घर ?

समय बहुत कम है तुम्हारे पास
आ चला पानी ढहा आ रहा अकास
शायद पुकार ले कोई पहचाना ऊपर से देखकर।

* कवि का फोटो hindilekhak.blogspot.com/2007/12/blog-post_4259.html से साभार

गुरुवार, जून 16, 2011

तीनों बन्दर बापू के / नागार्जुन

बाबा की जन्मशती पर प्रस्तुत हैं उनकी दो प्रसिद्ध कविताएँ -

तीनों बन्दर बापू के !
बापू के भी ताऊ निकले तीनों बन्दर बापू के !
सरल सूत्र उलझाऊ निकले तीनों बन्दर बापू के !
सचमुच जीवनदानी निकले तीनों बन्दर बापू के !
ग्यानी निकले, ध्यानी निकले तीनों बन्दर बापू के !
जल-थल-गगन-बिहारी निकले तीनों बन्दर बापू के !
लीला के गिरधारी निकले तीनों बन्दर बापू के !
सर्वोदय के नटवरलाल
फैला दुनिया भर में जाल
अभी जियेंगे ये सौ साल
ढाई घर घोडे की चाल
मत पूछो तुम इनका हाल
सर्वोदय के नटवरलाल

लम्बी उमर मिली है, ख़ुश हैं तीनों बन्दर बापू के !
दिल की कली खिली है, ख़ुश हैं तीनों बन्दर बापू के !
बूढ़े हैं फिर भी जवान हैं ख़ुश हैं तीनों बन्दर बापू के !
परम चतुर हैं, अति सुजान हैं ख़ुश हैं तीनों बन्दर बापू के !
सौवीं बरसी मना रहे हैं ख़ुश हैं तीनों बन्दर बापू के !
बापू को हीबना रहे हैं ख़ुश हैं तीनों बन्दर बापू के !
बच्चे होंगे मालामाल
ख़ूब गलेगी उनकी दाल
औरों की टपकेगी राल
इनकी मगर तनेगी पाल
मत पूछो तुम इनका हाल
सर्वोदय के नटवरलाल

सेठों का हित साध रहे हैं तीनों बन्दर बापू के !
युग पर प्रवचन लाद रहे हैं तीनों बन्दर बापू के !
सत्य अहिंसा फाँक रहे हैं तीनों बन्दर बापू के !
पूँछों से छबि आँक रहे हैं तीनों बन्दर बापू के !
दल से ऊपर, दल के नीचे तीनों बन्दर बापू के !
मुस्काते हैं आँखें मीचे तीनों बन्दर बापू के !
छील रहे गीता की खाल
उपनिषदें हैं इनकी ढाल
उधर सजे मोती के थाल
इधर जमे सतजुगी दलाल
मत पूछो तुम इनका हाल
सर्वोदय के नटवरलाल

मूंड रहे दुनिया-जहान को तीनों बन्दर बापू के !
चिढ़ा रहे हैं आसमान को तीनों बन्दर बापू के !
करें रात-दिन टूर हवाई तीनों बन्दर बापू के !
बदल-बदल कर चखें मलाई तीनों बन्दर बापू के !
गाँधी-छाप झूल डाले हैं तीनों बन्दर बापू के !
असली हैं, सर्कस वाले हैं तीनों बन्दर बापू के !
दिल चटकीला, उजले बाल
नाप चुके हैं गगन विशाल
फूल गए हैं कैसे गाल
मत पूछो तुम इनका हाल
सर्वोदय के नटवरलाल

हमें अँगूठा दिखा रहे हैं तीनों बन्दर बापू के !
कैसी हिकमत सिखा रहे हैं तीनों बन्दर बापू के !
प्रेम-पगे हैं, शहद-सने हैं तीनों बन्दर बापू के !
गुरुओं के भी गुरु बने हैं तीनों बन्दर बापू के !
सौवीं बरसी मना रहे हैं तीनों बन्दर बापू के !
बापू को ही बना रहे हैं तीनों बन्दर बापू के !

पाँच पूत भारतमाता के
पाँच पूत भारतमाता के, दुश्मन था खूंखार
गोली खाकर एक मर गया,बाकी रह गये चार

चार पूत भारतमाता के, चारों चतुर-प्रवीन
देश-निकाला मिला एक को, बाकी रह गये तीन

तीन पूत भारतमाता के, लड़ने लग गये वो
अलग हो गया उधर एक, अब बाकी बच गये दो

दो बेटे भारतमाता के, छोड़ पुरानी टेक
चिपक गया है एक गद्दी से, बाकी बच गया एक

एक पूत भारतमाता का, कन्धे पर है झन्डा
पुलिस पकड कर जेल ले गई, बाकी बच गया अंडा

(कविताएँ तथा चित्र क्रमशः कविताकोष तथा गूगल से साभार)

सोमवार, जून 06, 2011

ईश्वर का समय का पहिया : शेल सिल्वरस्टीन


ईश्वर का समय का पहिया

ईश्वर ने मुस्कुरा कर मुझसे पूछा एक दिन :
क्या तुम थोड़ी देर के लिए ईश्वर बनना चाहोगे
जिस से मन माफिक चला सको दुनिया?
ठीक है, कोशिश करके देखता हूँ...मैंने जवाब दिया.
पर मुझे मिलेंगे कितने पैसे?
कितनी देर का लंच टाइम होगा?
नौकरी छोड़ने की कोई शर्त तो नहीं?
बेहतर है भाई कि तुम समय का पहिया मुझे कर दो वापिस
मुझे नहीं लगता कि तुम इसके काबिल हो अभी...
ईश्वर ने शांत भाव से जवाब दिया.

माँ और ईश्वर
ईश्वर ने हमें दीं उँगलियाँ -- माँ कहती हैं: फ़ॉर्क से खाना खाओ
ईश्वर ने दी हमें आवाज -- माँ कहती हैं: चीखो मत
माँ कहती हैं ब्रोकोली, अन्न और गाजर खाने को
पर ईश्वर ने तो हमें आईसक्रीम के स्वाद चखने को दिए.
ईश्वर ने दी हमें उँगलियाँ-- माँ कहती हैं: रुमाल का इस्तेमाल करो
ईश्वर ने हमें दिया कीचड़ कादो --माँ कहती हैं: इनमें छपछप मत करो
माँ कहती हैं:शोर मत मचाओ ,अभी पापा सो रहे हैं
पर ईश्वर ने हमें फोड़ने पिचकाने को ढेर सारे डिब्बे दिए हैं.
ईश्वर ने दी हमें उँगलियाँ-- माँ कहती हैं: अपने दस्ताने पहन कर रखो
ईश्वर ने हमें दी हमें बारिश की बूँदें: माँ कहती है: बरसात में भीगो मत
माँ चेताती है संभल के रहना,बहुत पास मत जाना
उन अजूबे प्यारे पिल्लों के जो ईश्वर ने हमें दिए.
ईश्वर ने दी हमें उँगलियाँ--माँ कहती हैं: जाओ इनको धो कर आओ
पर ईश्वर ने दिए हमें कोयले के ढेर और सुन्दर लेकिन गंदे शरीर
मैं बहुत सयाना तो नहीं हूँ पर एक बात निश्चित है:
या तो माँ सही होगी..या फिर ईश्वर.

बुधवार, मई 25, 2011

सन्तोष कुमार वर्मा की कविताएँ

संज्ञान
फूल, प्रेमपत्र, सुगंध
लिखने को बनी कलम
खुद-ब-खुद जब उतारने लगे
रक्त, आग और गालियाँ पन्नों पर
तब उँगलियों को चाहिए -
कलम छोड़कर
मुट्ठी बन जाएँ।

बिजूका

खेत में जो बिजूका है
जो डरता है, डरे
जो हों दुस्साहसी, चालबाज
खेत चरें।

नपुंसक बिजूका
कुछ शांतिप्रिय कबूतरों
और बुलबुलों की ओर
अपनी कलूटी खोपड़ी पर उगी
कुटिल आँखें तरेरता है।

छुट्टे साँडों और
मदमस्त हाथियों के स्वागत में
‘अतिथि देवो भव’ उवाचता बिजूका
अपनी बाँहें क्षैतिज पसारे
रौंद दिये गये खेत से
आँखें फेरता है।

कौए की सामूहिकता
सड़क पर
गंदा पानी फैल रहा है
मैं अपना दरवाजा
और ऊँचा कर लूँगा।

पड़ोसी का बेटा ड्रग्स लेता है
कोई बात नहीं
अपना मुन्ना तो नशेड़ी नहीं।

शहर में दंगे के आसार हैं
यहीं मैं बहुसंख्यक हूँ।

रिक्शा वाला पूरे पैसे माँग रहा था
पिट रहा है
हमें क्या पड़ी
किसी के फटे में टाँग फँसाने की।

सरे-राह लड़की गायब हो गयी
मेरी बहन तो घर में होगी।

गाँधी के तीनों बंदर
आज हमारे शागिर्द होते।

जरा एक कौआ मार के
आँगन में टाँग दो
और देखो मजा।


(सन्तोष के परिचय में केवल इतना ही कि वे पेशे से डिप्टी जेलर हैं और उनकी ये कविताएँ सरकारी नौकरी में आने से पहले लिखी गयी हैं।)